फिर खुद को पाना
यह ग़ज़ल आत्ममंथन, खोई हुई उम्मीद और फिर खुद से प्रेम करने की यात्रा को बेहद खूबसूरती से बयां करती है।

यह ग़ज़ल आत्ममंथन, खोई हुई उम्मीद और फिर खुद से प्रेम करने की यात्रा को बेहद खूबसूरती से बयां करती है।
“फटी सी कमीज़, नेकर, एक हाथ में चाय की केतली और दूसरे में कप… सीतलामाता बाज़ार के मजदूर चौक पर आवाज़ गूंजती—‘ए छोटू, दो कट भर दे!’ बचपन की वो सुबहें, जब पचास पैसे रोज़ की मजदूरी के लिए चाय बनाना, दुकान-दुकान चाय पहुंचाना और फिर स्कूल भागना… आज भी जब खुद के लिए चाय बनाता हूं, वो छोटू मुझमें अब भी ज़िंदा लगता है।”
त्योहारों के मौसम में यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मध्य रेल ने बड़ी घोषणा की है। इस बार पूजा, दिवाली और छठ पर्व के लिए कुल 1126 विशेष ट्रेनें चलाई जाएँगी। इनमें से 182 नई विशेष ट्रेनें अभी घोषित की गई हैं, जबकि 944 ट्रेनें पहले ही घोषित हो चुकी हैं। रेलवे प्रशासन का कहना है कि नई ट्रेनों से मुंबई, पुणे और अन्य शहरों से बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना जाने वाले यात्रियों को सीधी सुविधा मिलेगी।
जयपुर में किराये के घर के नीचे रहने वाली 80-85 साल की अम्माजी ने मुझे दोस्त बना लिया था। हिसाब-किताब में पक्की, आवाज़ में रौब — और उम्र में अद्भुत ताक़त। बेटियाँ पास थीं, बेटा विदेश में पर उनके मन में सबसे बड़ी खाली जगह बेटे ने ही छोड़ी थी। वह मुझे बहाने से बुलातीं, गाने सुनातीं, और कहतीं “बात कर लिया करो, अच्छा लगता है।”
दिवाली से ठीक पहले वह बाथरूम में गिर गईं। ऑपरेशन हुआ। बेटियाँ दौड़-भाग में, और एक्सरसाइज़ मेरा काम। irritation भी होती थी, पर उनसे मोह भी हो गया।
गरिमामय एवं आत्मीय समारोह में 4 दशक से मैदानी पत्रकारिता के पर्याय बने वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा की प्रथम कृति ‘किस्से कलमगिरी के’ का लोकार्पण जाल सभागृह में आयोजित हुआ। समारोह के अतिथि जीवन प्रबंधन गुरु पं. विजय शंकर मेहता, महापौर पुष्यमित्र भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिंदुस्तानी, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता महा विद्यालय भोपाल के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी थे। अध्यक्षता राष्ट्र कवि संचालक सत्यनारायण सत्तन ने की।
सावन केवल बारिश का मौसम नहीं, बल्कि प्रकृति के नवजीवन, प्रेम, उल्लास और बचपन की मीठी यादों का उत्सव है। प्रस्तुत कविता “रिमझिम-रिमझिम सावन बरसे” में वर्षा की पहली फुहार, मिट्टी की सौंधी महक, मोर-पपीहे का उल्लास, हरी चूड़ियों की खनक और कागज़ की नावों से जुड़े बचपन के अनमोल पल अत्यंत सुंदर ढंग से अभिव्यक्त किए गए हैं।
हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।
मुंबई की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘गुलदान’ द्वारा आयोजित हस्तीमल ‘हस्ती’ स्मृति सम्मान समारोह में हिंदी–उर्दू साहित्य, संगीत और नृत्य का भावपूर्ण संगम देखने को मिला। कार्यक्रम में देशभर के कवि–शायरों की उपस्थिति रही, वहीं वरिष्ठ साहित्यकारों को सम्मानित किया गया। यह आयोजन साहित्यिक स्मृतियों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त प्रयास बना।
इस जगत में बेज़ुबान पशु-पक्षी हमारे लिए भोजन (दूध, मांस, अंडे), कृषि (खेत जोतना), परिवहन (बोझ ढोना), वस्त्र (ऊन, चमड़ा), दवा (अनुसंधान) और भावनात्मक सहारे (पालतू जानवर) जैसे अनेक रूपों में अत्यंत उपयोगी हैं। वे न केवल हमारे जीवन के हर पहलू में योगदान देते हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।