रीता मिश्रा तिवारी की कहानी “खामोश घर की दीवारें फुसफुसाती है” का अंतिम भाग

रीता मिश्रा तिवारी
आपने पढ़ा…
“पहचाना नहीं, आप कौन?” ये शब्द उस आगंतुक के सीने में शीशे की तरह चुभ गए।
अब गतांक से आगे…
उसे एहसास हुआ कि सब खो दिया… उसने सोचा, स्वाभाविक है, गलती तो मेरी है। कितने साल गुजर गए… कितना कुछ बदल गया।
कच्चे घर, कच्ची सड़कें पक्की हो गईं। गाड़ियाँ चलने लगीं, मतलब गाँव छोटे शहर में तब्दील हो गया।
उसने झुककर उनके पैरों को छूकर प्रणाम किया, “बाबा, मैं हूँ मोहन..!”
श्यामबाबू जड़वत खड़े रहे। होंठ भींच लिए। अंदर उत्साह और आक्रोश उमड़-घुमड़ रहा था।
“मोहन… कौन मोहन…?” पैरों के साथ आवाज में भी कंपन था। वे धप्प से आरामकुर्सी पर बैठ गए।
“बाबा, बरसों पहले आप सबको छोड़कर अमेरिका चला गया था, आपका बेटा मोहन…” उसकी आँखों से आँसुओं का सैलाब बह निकला।
बार-बार एक ही शब्द बोल रहा था, “बाबा, मुझे माफ कर दो..! पैसों की अंधी दौड़ में इतना अंधा हो गया था कि ये तक भूल गया कि मेरी असली दौलत तो यहाँ इस चौखट पर मेरा इंतजार कर रही है।”
श्यामबाबू उसके आँसुओं को पोंछते हुए बोले, “आज तो खुशियों का दिन है। हैप्पी बर्थडे..! थक गए होगे। फ्रेश हो जाओ। तुम्हारी पसंद का खाना बना है। भोजन करके आराम करो..।”
“आपको सब याद है, बाबा..?”
“बुढ़ापा आया है, याददाश्त नहीं गई..!”
कमरे में जाने से पहले कुछ देर ठहर गया मोहन। घर का कोना-कोना देखा, जहाँ मजबूत बुनियाद पर डटी, किंतु वर्षों तक ख़ामोश खड़ी रही कोठी और बेरंग कुर्सी थी, जो कभी महफिलें जमाया करती थी। सीलन भरी छत पर मकड़ियों का जाला, दीवारों से गुजरती चींटियों की रेलगाड़ी देखकर याद आया, इसी आँगन में हम दोस्तों के साथ रेलगाड़ी-रेल गाड़ी खेला करते थे।
किशन हमेशा कहता, “तुम्हारे घर की दीवारें कितनी चिकनी, चमकदार और सुंदर हैं, जैसे अभी बोल पड़ेंगी।”
रवि अपने डैडी के मन को ताड़ गया।
“मुझे जानकारी नहीं थी, डैडी..! आप इतनी जल्दी आ जाएँगे। वैसे रिपेयरिंग का काम चालू है.. वो क्या है न कि मैं कंपनी के जरूरी काम से बाहर गया था, तो काम बंद करवा दिया था। दादू मजदूर नहीं खटवा सकते थे इसलिए। मिस्त्री के घर शायद कोई घटना घट गई थी, तो..”
“बेटे, कोई न… तुम्हारी गलती नहीं, मेरी है। हमने कभी समझा ही नहीं। खैर, चिंता मत करो..!”
सर्दी में भी मोहन के कपाल पर पसीने की बूँदें उभर आई थीं।
उसने जेब से रूमाल निकालकर पसीना पोंछा और अपने कमरे की चौखट पर आ खड़ा हुआ।
हर किसी की आहट पहचानता था चौखट।
दरवाजे की ऊपरी परत चरमराकर उसका स्वागत कर रही थी। अफसोस या प्यार से सहलाकर उसने कमरे के अंदर कदम रखा। ताजगी के लिए खिड़की का पल्ला खोला तो उसने अपनी कमजोरी का परिचय दिया। मोहन ने उसे अपनी हथेलियों का सहारा देकर संभाल लिया।
“अब सब ठीक होगा… आ गया हूँ मैं..!” उसने खुद से कहा।
शायद इसी पल का इंतजार था इन चारदीवारियों को, इस खिड़की को… चहककर खिड़की फुसफुसाई…
याद है तुम्हें, जब भी तुम तनाव या गुस्से में होते थे तो मेरा पल्ला पकड़कर तुम घंटों खड़े रहकर बाहर चाँद से मन की बातें करते थे।
परेशानियों का हल तुम्हें इसी खिड़की पर खड़े रहकर मिलता था।
याद करो वो दिन, जब तुमने इसी खिड़की के पास खड़े होकर चाँद को निहारते अपनी पत्नी से कहा था…
“मैं विदेश जाना चाहता हूँ, बल्कि जा रहा हूँ। बाबा से स्वीकृति मिल गई है। चिंता मत करो, कुछ महीनों की बात है। एक बार वहाँ नौकरी मिल जाए, व्यवस्थित हो जाऊँ, फिर आकर तुम्हें और रवि को साथ ले जाऊँगा।”
बहुत-सी ऐसी बातें हैं, जो शायद तुम्हें याद भी नहीं..! खैर, एक बात जान लो, इस घर को रंग-रोगन और मरम्मत की नहीं, प्रेम की दरकार है..!
बगैर आहट के अलमारी के पास आ खड़ा हुआ मोहन। चाबियाँ ढूँढ़ीं, पर नहीं मिलीं उसे।
नहीं मिलेगी चाबी। याद भी है, तूने कहाँ रखी है..? अलमारी फुसफुसाई..!
“हाँ, याद है। जाने से पहले चाबियाँ अम्मा को देकर गया था..!”
तभी श्यामबाबू की आवाज उसके कानों से टकराई, “बाथरूम गंदा होगा। रवि के रूम में चला जा या नीचे कुएँ पर स्नान कर ले..!”
“क्या..! कुआँ अभी भी है..?”
“सब अपनी जगह वैसे ही है। कुछ भी नहीं बदला, सिवाय तुम्हारे..!”
श्यामबाबू अब बहुत खुश रहते थे, जिनका असर उनके स्वास्थ्य पर झलक रहा था, परंतु हर वक्त एक आशंका में घिरे रहते। कभी खुद ही खुद को समझा लेते, पर किसी से कुछ कहते नहीं थे, खासकर मोहन से दूरी बनाकर रखते।
खुशहाल जिंदगी के महीने बीत गए।
आज सुबह मोहन को बैग लेकर बाहर जाते देखा तो अजनबी टोन में श्यामबाबू बोले, “जा रहे हो क्या..?”
“बाबा..! कुछ डॉक्युमेंट्स का काम था तो..”
“अच्छा..! कहीं मेरी प्रॉपर्टी का..!”
“नहीं बाबा, ऐसा कुछ भी नहीं है। आकर बताता हूँ..!”
अगले दिन भोजन करते मोहन ने झिझकते हुए श्यामबाबू से कहा, “बाबा..! इस बार मैं छुट्टियाँ बिताने या सिर्फ कुछ महीनों के लिए या अपने बेटे के लिए नहीं आया हूँ। आपके लिए आया हूँ।
नौकरी छोड़कर अपनी कंपनी खोली थी वहाँ। मैंने अपनी कंपनी का ट्रांसफर भारत ही करवा लिया है। अब मैं यहीं आपके पास रहूँगा। रवि, मैं और आप सब एक साथ रहेंगे..!”
सुनकर श्यामबाबू के हाथ से रोटी का निवाला छूटकर प्लेट में गिर गया।
उन्होंने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में पश्चाताप और सच्चा प्यार साफ झलक रहा था।
श्यामबाबू के सब्र का बाँध टूट गया और आँखों के रास्ते आँसू बहने लगे।
मोहन का हाथ थामकर बोले, “दस साल तुम्हारी पत्नी तुम्हारी राह देखते-देखते कैंसर जैसी बीमारी को गले लगा लिया और दुनिया से विदा हो गई।
बेटा जी..! बीस साल तुम्हारी अम्मा इस सूने आँगन में तुम्हारे और रवि की याद में अपने प्राण त्याग दिए।
दस साल मैंने इस सूनी कोठी में तुम्हारी अम्मा की यादों में दिन काटे हैं।
फिर रवि आया, दिन अच्छे गुजरने लगे। कोई कमी नहीं थी, बेटा जी… हमें पैसों की जरूरत नहीं, तुम्हारी जरूरत थी..!”
पिता को कसकर गले से लगाकर जार-जार रोते हुए मोहन ने कहा, “डॉलर कमाने के पीछे मैं अंधा हो गया था, बाबा..!
पीछे मुड़कर देख ही नहीं पाया कि आप सब किस हाल में हैं।
बहुत बड़ा अपराध किया है मैंने, बाबा। माफी के लायक नहीं हूँ। माफ कर दीजिए। बस एक मौका दीजिए, सारी शिकायतें दूर कर दूँगा..!”
“बेटा जी..! बीते वक्त को कोई नहीं लौटा सकता, फिर भी दिया मौका..”
उस रात वर्षों बाद घर में खुशियों की दिवाली थी।
रसोई से तरह-तरह के पकवानों की खुशबू आ रही थी। रवि के हाथ की बनी चने-साग के चटकारे की गूँज से आँगन का सन्नाटा हमेशा के लिए दूर हो गया था।
आज दीवारें फुसफुसा नहीं रही थीं, बल्कि चीख-चीखकर कह रही थीं…
“श्यामबाबू..! ये सिर्फ एक बेटे की वापसी नहीं, एक परिवार की वापसी है..!”
