
जगदीश कौर, प्रयागराज
पता नहीं कितने ग़मों का बोझ उठाएगी कविता।
इस बार मेरा पूरा प्यार पाएगी कविता।।
मैं चाहती हूँ चाँद, सितारे, रोशनी, धूप लिखूँ।
पर कलम से मन की व्यथा उतारेगी कविता।।
रूहहीन हो गया सफ़र अब मेरे लेखन का।
घरौंदा टूटकर बिखर गया मेरी कल्पना का।
शब्द मौन होकर दिशाहीन-से हो गए।
पता नहीं कब तक ज़िंदा रह पाएगी कविता?
हौसले के पंखों से आत्मा का परिंदा न उड़ सका।
घर से रूठा हुआ मन विदेशों से न मुड़ सका।
दिमाग भी वेदना, संवेदना से भारी है।
इन सबको अब कैसे सँभालेगी कविता?
कुछ बाहर का तो कुछ अंदर का शोर है।
तन्हाई का अँधकार भी छाया घनघोर है।
सहमी है परछाईं, आँखें भी भयभीत हैं।
इन्हें कैसे हौसला अब दिलाएगी कविता?
रिश्तों की उधेड़बुन से ज़िंदगी का कपड़ा नहीं बचा।
उधार के बाग़वान से घर का उपवन है भरा।
कौन अपना है, कौन पराया है सफ़र में?
इसे सचमुच पहचान पाएगी यह कविता?
मन के क्रंदन से वाणी का रुदन भी जारी है।
शोर से दूर अब ख़ामोशी की तैयारी है।
हर तरफ़ माहौल आतंकी, चुप रहना लाचारी है।
हे ईश्वर! कब तक सच कह पाएगी कविता?
सुकरात आत्महत्या न करता तो मर जाता।
ऐसी लाचारी में कब तक ज़मीर बचाएगी कविता?
देश की कलम भी अब बेज़ुबान हो गई।
फिर से कैसे इसे शब्द दे पाएगी कविता?
