कविता कब तक सच कह पाएगी ?
यह कविता मन की वेदना, बिखरती कल्पनाओं, रिश्तों की उलझनों और सामाजिक परिस्थितियों से उपजी बेचैनी की अभिव्यक्ति है। जब शब्द मौन होने लगते हैं और सच कहना कठिन हो जाता है, तब कविता अपने अस्तित्व, संवेदना और ज़मीर को बचाए रखने का सवाल उठाती है।
