भारतीय ज्ञान परंपरा का वास्तविक चरित्र समावेशी है : अम्बिका दत्त शर्मा

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र कोलकाता और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR) नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परंपरा और विज्ञान का दर्शन” विषय पर २८-२९ अगस्त को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ।उद्घाटन सत्र में डॉ. अमित राय (संयोजक) ने स्वागत भाषण दिया। विशिष्ट अतिथि बिट्ठलदास मूंधड़ा और मुख्य अतिथि प्रो. नवीन चंद्र लोहानी रहे। प्रो. अम्बिका दत्त शर्मा ने बीज वक्तव्य दिया, जबकि अध्यक्षीय उद्बोधन प्रो. हनुमानप्रसाद शुक्ल ने किया। संचालन डॉ. अमरेन्द्र कुमार शर्मा और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. चित्रा माली ने किया।

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साथ चलो, बस थोड़ी दूर…

साथ चलो, बस थोड़ी दूर। वक्त को हमसफ़र बनाकर जीवन की इस राह पर कदम बढ़ाते चलो। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो रोज़—कभी तो साथ चलना होगा। रास्तों के मोड़ पर, थकान के क्षणों में, जब भी मन डगमगाए, तुम्हारा साथ राह को आसान बना देगा। दूरियों के बहाने छोड़ो, भीड़ और शोरगुल में भी एक पल का साथ बहुत है। टूटे हुए ख्वाबों की चुभन और धोखे की चोट भले ही हो, फिर भी जिगर की गहराइयों में छिपा अपनापन पुकारता है—थोड़ी दूर साथ चलो। रीलों के इस दौर में, जहाँ जिस्म की नुमाइश ने अपनापन छीन लिया है, वहाँ सच्चा साथ ही सबसे बड़ी ताकत है। नींद भले ही आँखों से कोसों दूर हो, मगर जागे पलों की तन्हाई में यही ख्वाहिश मन को बार-बार पुकारती है—थोड़ी दूर साथ चलो।

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“सृजनिका” के छठे अंक का गरिमामयी लोकार्पण

मुंबई से प्रकाशित त्रैमासिक हिंदी साहित्यिक पत्रिका सृजनिकाके छठे अंक का लोकार्पण मंगलवार, 26 अगस्त को कुर्ला स्थित यूकेएस इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ एंड रिसर्च के सभागार में हुआ.
समारोह के मुख्य अतिथि हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के कार्यकारी निदेशक (नॉन-फ्यूल बिज़नेस) मुरलीकृष्ण वेंकट वाद्रेवु ने हिंदी को व्यवसाय-वृद्धि की महत्वपूर्ण सहयोगी भाषा बताते हुए अपने अनुभव साझा किए.

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इंतजार में अमृता प्रीतम…

यह रचना अमृता प्रीतम, साहिर और इमरोज़ की अमर प्रेमकथा की संवेदनाओं को छूती है। लेखिका के अंतर्मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या स्वयं वह अमृता जैसी हो सकती है, जिसे साहिर का अल्हड़ किन्तु अनकहा प्रेम मिला और इमरोज़ का निःस्वार्थ साथ। प्रेम की यह त्रयी—अनकहे भाव, निस्वार्थ समर्पण और अनंत प्रतीक्षा—मानव हृदय के उस गूढ़ कोने को उजागर करती है जहाँ प्रेम अपनी सीमाओं और परिभाषाओं से परे जाकर केवल “होने” में अर्थ पाता है। यही सोच अमृता को कालजयी बनाती है और यही प्रश्न आधुनिक मन को बेचैन करता है—क्या अब भी ऐसा दुर्लभ प्रेम संभव है?

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कमला का द्वंद

कमला की कहानी उस हर औरत की दास्तान है जो समाज की रूढ़ियों, अपेक्षाओं और तानों के बीच अपनी पहचान खो बैठती है। सुंदरता, प्यार और त्याग के बावजूद वह केवल “बेटियों की माँ” कहलाकर अपमानित हुई। पति के छोड़ जाने के बाद भी उसने बेटियों की परवरिश अकेले की और जीवन भर सुहागन और विधवा के बीच के द्वंद में पिसती रही। यह कथा समाज की विडंबना को उजागर करती है—जहाँ स्त्री को उसके अस्तित्व से नहीं, बल्कि समाज की बनाई कसौटियों से आँका जाता है।

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राधाष्टमी : राधा-कृष्ण प्रेम की अनंत व्याख्या

भारतीय संस्कृति में प्रेम का सर्वोच्च रूप राधा और कृष्ण के संबंध में मूर्त होता है। राधाष्टमी का पर्व केवल राधा के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उस शाश्वत प्रेम का प्रतीक है, जिसमें आत्मा और परमात्मा का संगम झलकता है। राधा का व्यक्तित्व केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण और आत्मविस्मृति का प्रतीक है। साहित्य में सूरदास, रसखान, बिहारी, जयदेव और नन्ददास जैसे कवियों ने राधा-कृष्ण प्रेम को लौकिक से परे जाकर अध्यात्म से जोड़ा है। राधा का प्रेम मिलन में ही नहीं, बल्कि विरह में भी पूर्ण है। यही निष्काम समर्पण उन्हें भक्ति का शिखर बनाता है। आज के समय में राधा-कृष्ण का प्रेम हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि अर्पण से जीवित रहता है। राधाष्टमी का संदेश है—प्रेम को भौतिकता से ऊपर उठाकर जीवन को आध्यात्मिक सौंदर्य से भरना।

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महिला काव्य मंच लखनऊ इकाई की काव्य गोष्ठी संपन्न

महिला सशक्तिकरण एवं साहित्य साधना को समर्पित महिला काव्य मंच (मध्य) की लखनऊ इकाई द्वारा मासिक काव्य गोष्ठी का सफल ऑनलाइन आयोजन दिनांक 29 अगस्त 2025 को किया गया.
इस साहित्यिक आयोजन की मुख्य अतिथि रहीं डॉ. स्वदेश मल्होत्रा (अध्यक्ष, महिला काव्य मंच, अयोध्या) तथा विशिष्ट अतिथि रहीं डॉ. गीता मिश्रा. कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. राजेश कुमारी (राष्ट्रीय अध्यक्ष, शिक्षा मंच) के प्रस्तावना भाषण से हुआ. उन्होंने अपनी अध्यक्षीय उद्बोधन में मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए महिला काव्य मंच के उद्देश्यों और साहित्यिक गतिविधियों की सार्थकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने लखनऊ इकाई की सक्रियता और निरंतरता की सराहना करते हुए सभी कवयित्रियों को बधाई भी दी.

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“पूर्णिमा की रात समुद्र किनारे चाँदनी में चमकती लहरें, शांत वातावरण में भावनात्मक गहराई का दृश्य”

लहरें…

यह कविता शांत चित्त और गहरी भावनाओं को चाँद और समुद्र की लहरों के माध्यम से व्यक्त करती है, जहां मिलन की तड़प और प्रकृति का अद्भुत संबंध झलकता है।

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मन 

यह कविता रिश्तों में पसरी हुई खामोशी और मन की गहराइयों में उपजी पीड़ा का चित्रण करती है। कवि कहता है कि यह खामोशी, मन को एक निर्जल और सूने कुएँ में धकेल देती है, जहाँ आकुलता और विकलता का साया छा जाता है। वहाँ न कोई चाहत होती है, न उम्मीद—नव अंकुर फूटने की संभावना भी नहीं।मन के किसी कोने में आशाएँ और अभिलाषाएँ सुंदर यादों की पोटली बनकर धरी रह जाती हैं। हर अहसास धीरे-धीरे पिघलकर पतझड़ के मौसम में बदल जाता है, और अंततः यह मन एक बांझ धरा की तरह फट पड़ता है।

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छोड़ो ना अपना क्या जाता है… 

यह कविता हमारे समाज की उस लाचारी और बेपरवाही को सामने लाती है, जहाँ हर समस्या पर हम क्षणभर दुखी तो होते हैं, लेकिन अंततः जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। चाहे गटर में जान गंवाने वाला सफाईकर्मी हो, ढहते पुलों से बर्बाद होते परिवार हों, अस्पतालों में इलाज़ के अभाव में मरते लोग हों या शिक्षा का बाज़ारीकर हर अन्याय और त्रासदी हमें झकझोरती है, पर अंत में वही विचार मन में गूंजता है: *“अपना क्या जाता है?”* यह रचना समाज से संवेदनशील और जिम्मेदार होने की पुकार है।

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