धूप, चाय और करुणा: जनवरी की सीख

जनवरी की धूप में चाय पीते हुए आत्मचिंतन करती महिला, सर्दी और मानवीय संवेदना का दृश्य

पूनम सिंह, प्रसिद्ध लेखिका

मेरी प्यारी जनवरी,

इतने लंबे इंतज़ार के बाद जब तुम आईं, तो लगा जैसे सब कुछ नया-नया हो गया हो। तुम्हारे आने का बहुत चाव था और तुम्हारे साथ जश्न मनाने का भी। भले ही तुम कड़कड़ाती ठंड के साथ आईं, लेकिन ठंड में धूप सेकना, मूँगफली खाना और गरमा-गरम चाय पीना उसका आनंद ही कुछ और होता है।सच कहूँ तो तुम्हारा इंतज़ार मुझे इसलिए भी रहता है क्योंकि जब तुम आती हो, तो मैं हमेशा कोई न कोई संकल्प लेती हूँ और पूरी कोशिश करती हूँ कि उसे पूरा कर सकूँ।

वैसे तो तुम्हारे आने पर मुझे सब कुछ अच्छा लगता है, पर एक बात है जो मुझे दुखी करती है वे बेचारे गरीब लोग, जो सड़क किनारे पन्नी में या खुले आसमान के नीचे सिकुड़कर रात बिताते हैं। सच में, उन्हें देखकर बहुत दुख होता है। हालाँकि मैं हर बार उन्हें गरम कपड़े, कंबल आदि देने की कोशिश करती हूँ, लेकिन उनका दुःख पूरी तरह दूर नहीं कर पाती। काश, मैं उन्हें वह सब दे पाती जिसकी उन्हें सच में ज़रूरत है।

ख़ैर…

तुमसे एक बात तो मैंने ज़रूर सीखी है कि शुरुआत हमेशा शोर नहीं करती, कभी-कभी वह ख़ामोशी से भी होती है। और अब देखते-देखते तुम चुपचाप चली जा रही हो। जाना तो तुम्हें है ही, और न ही मैं तुम्हें रोक सकती हूँ क्योंकि जाने वाले को कोई रोक नहीं सकता।जाओ, हँसी-खुशी जाओ। बस जाते-जाते मुझसे एक वादा करके जाना कि अगली बार भी मुझसे मिलने ज़रूर आओगी।

तुम्हारी एक सखी

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