
दिव्या सिंह, प्रसिद्ध लेखिका
रात, तेज़ हवाओं के साथ अचानक बादलों के गरजने की आवाज़ सुन कर वह उठ गई। घड़ी देखी रात के तक़रीबन डेढ़ बज रहे थे। लगता है बारिश हो रही है। वह अचानक उठी और दरवाज़ा खोलकर बालकनी की तरफ बढ़ गई।
रविवार और सोमवार की दरम्यानी रात थी, आज छुट्टी थी। सो कपड़े धोए थे, लेकिन बारिश इतनी तेज़ थी कि सारे कपड़े गीले हो गए। छज्जे के नीचे के कपड़े थोड़े कम गीले थे, लिहाज़ा वह उन्हें उठा कर अंदर ले आई और मन ही मन बुदबुदाई-“यार, इस बारिश को भी आज ही आना था।”
कपड़े ड्राइंग रूम में रैक खोल कर सूखने डाल दिए। वापिस आ कर सोने की कोशिश करने लगी। मन ही मन सोच रही थी कि मई के महीने में बिना आंधी इतनी तेज़ बारिश! ऐसा लगता था मानो सावन-भादों की रात हो, ऐसी झमाझम बारिश हो रही थी। मौसम भी इंसानों की तरह बदल रहा था। सोचते-सोचते कब सो गई, मालूम नहीं चला।
अगले दिन उठी तो सुबह का मौसम देख लग रहा था मानो महीना मई का नहीं, अगस्त का हो। बेहद खुशगवार मौसम था। आसमान बादलों से मढ़ा हुआ था। पेड़-पौधे भी पानी से धुलकर एकदम हरे-भरे लग रहे थे। वह अपनी बालकनी में खड़ी, मंत्रमुग्ध होकर पेड़ों पर गिलहरियों को खेलते और एक-दूसरे के साथ अठखेलियां करते देख रही थी।
तभी उसे ख्याल आया गैस पर चाय रखी थी। जल्दी से अंदर आई, बालकनी से चाय छानी और ड्राइंग रूम में बैठ कर पीने लगी। पति दफ़्तर के काम से बाहर गए हुए थे, सो घर में वह अकेली ही थी। मन कर रहा था कि दफ़्तर से छुट्टी ले कर कुछ घर के पेंडिंग काम करे, मगर इलेक्शन थे, लोकसभा के, सो छुट्टी मिलना आसान ही नहीं, नामुमकिन था।
भारी मन से उठी और नहाने चली गई। पति जब घर में नहीं होते तो वह अपने लिए नाश्ता और खाना नहीं बनाती थी, उस दिन भी ऐसा ही किया। नहा कर आई और नीले रंग का कुर्ता, सफेद चूड़ीदार पहन कर तैयार हो गई। उसे चूड़ियों का बेहद शौक़ था, सो नीले और सफेद रंग की हाथ भर-भर कर चूड़ियां पहनी, कानों में सफेद मोती की बाली डाली, माथे पर नीली बिंदी लगाई।
खूबसूरत तो वह थी ही, गोरे रंग पर नीली बिंदी ऐसी लग रही थी मानो नीला आकाश छोटा हो कर चाँद के आगोश में समाने को बेताब हो। खुद को एक बार आइने में देखा और कमरा लॉक कर ड्राइंग रूम में आ गई। घर की सारी लाइटें बंद कीं और गीले कपड़ों के रैक को पंखे के नीचे रख कर ड्राइंग रूम का पंखा चला दिया।
बाहर गेट पर ताला मारकर ऑफिस के लिए निकल गई। कॉलोनी के बाहर निकल कर एक ऑटो पकड़ा, मोलभाव किया और बैठ गई। बारिश इतनी तेज़ हुई थी कि सड़कों के दोनों ओर पानी भर गया था, खाली पोखर भी भर गए थे। अभी भी आसमान साफ़ नहीं था। बादल घुमड़-घुमड़ कर आसमान में छा रहे थे। लगता था कभी भी मूसलाधार बारिश हो सकती है। ऑटो की घरघराहट में भी बादलों की गरज सुनाई दे रही थी। बिजली ऐसे लपक रही थी मानो ज़मीन पर बसने वालों को जीभ दिखा रही हो, चेतावनी दे रही हो कि इंसानों, तुमने खूबसूरत धरती के सीने पर जो बुल्डोज़र और कुल्हाड़े चलाए हैं और प्रकृति की सुंदरता के साथ जो खिलवाड़ किया है, मैं इसके लिए तुम्हें नहीं बख्शूंगी।
इतने में उसके फोन की घंटी बज़ी। ध्यान भंग हुआ। उसने तुरंत फोन उठाया और स्क्रीन पर देखा-ओह! ऑफिस से बॉस का कॉल।
“क्या हुआ?”
“गुड मॉर्निंग सर, आ रही हूं, रास्ते में हूं।”
“अरे घबराओ नहीं। आज का तुम्हारा शूट कैंसिल हो गया है। खबर मिली है कि सोनिया गांधी बड़े ही गोपनीय ढंग से विदेश रवाना हुई हैं, उनकी तबियत खराब है। कल के प्रोग्राम की लाइनअप तैयार करो और आज आराम करो।”
“ओके सर, मैं रास्ते में ही थी, बस आधा घंटा लगेगा।”
“कोई बात नहीं, पिछले दो महीने से वीक ऑफ भी नहीं लिया। आराम करो।”
“हां, लेकिन कल दो शख्सियत के प्रोग्राम शूट करने हैं, कोई गड़बड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
“ओक सर, नो प्रॉब्लम। थैंक्स सर, बाय।”
आह भर कर बोली-“थैंक गॉड! बिलकुल मन नहीं था ऑफिस जाने का। काश पहले फोन कर देते।”
ऑटो में बैठते हुए उसने ऑटो वाले से कहा-“भइया, आगे जो नहर पड़ती है ना, वहां मुझे उतार दीजिए।” थोड़ी ही दूरी पर नहर थी। ऑटो वाले को पैसे दिए, वह उतर गई।
नहर के आसपास छोटी-छोटी झोपड़ियां बनी थीं। छप्पर पर कहीं ककड़ी के बेल, कहीं कद्दू और लौकी की बेलें, तो कहीं जंगली फूलों की बेल फैली हुई थी। हवा के झोंकों के साथ पानी की लहरों की अठखेलियां और उसकी आवाज़ एक अजीब सा संगीत पैदा कर रही थी। अनुमेहा एक जगह जड़त्व हो गई। प्रकृति की इस खूबसूरती को देख कर मन ही मन सोच रही थी-“कितने किस्मत वाले हैं ये लोग, जो प्रकृति के इतने करीब और शांत जगह पर रहते हैं।”
तभी हवा के तेज झोंके के साथ पानी की लहर उछली और पत्थर से टकराकर उसके गालों को भिगो गई। पतली बालों की लट भी भीग गई। सकपका कर उसने दुपट्टे से अपना मुंह पोंछा और पानी को देखते हुए आगे बढ़ी।
भगवान, इतने बुरे इंसानों के बीच तूने कितने खूबसूरत प्राकृतिक नज़ारे बनाए हैं! इतने खूबसूरत फूल! मानो किसी दूसरी दुनिया में आ गई हो।
अनुमेहा नहर के करीब चलते-चलते आगे निकल आई। पत्थरों की दीवार पर बैठ गई, चारों तरफ ठंडी हवा में चुन्नी को समेटते हुए मुस्कुरा रही थी।
वह देख रही थी कि पत्थरों की दीवार से थोड़ी दूरी पर गड्ढे में भरा पानी कितना साफ़ और शांत है। उसकी नज़र पानी में पत्थरों के बीच उगी कोमल घास पर पड़ी, जो लहरों के साथ अठखेलियां कर रही थी।
पानी के थपेड़े इतने तेज़ थे कि लगता था जैसे घास को खत्म करने वाला है। हरी घास पर नारंगी कलियां बेहद खूबसूरत लग रही थीं। अनुमेहा को बचपन याद आया-प्यारे लोग उसे “अनु” कहते थे।
बारिश में भीगना उसे बेहद अच्छा लगता था। आसमान से गिरते पानी को ऊपर मुंह करके देखना, आंख या नाक में पानी चला जाए तो खिलखिला कर हंसना। कच्छी पहनकर छत्त की नालियों में छप-छप खेलना, पड़ोस के बच्चों के साथ मौज-मस्ती करना-यह सब बचपन की यादें ताज़ा हो गईं।
उस दिन उसने पड़ोस की राधा के साथ कागज के जहाज चलाए। पानी की हरक़त और खेलों के बीच कभी-कभी उसे डांट भी खानी पड़ी। फिर उसने पड़ोस के लड़के मनोहर के साथ तालाब में मेंढ़क पकड़ लिए और घर लौटकर मां से गले लग गई।
घर आकर उसने देखा कि पानी में उसका प्रतिबिंब सतरंगी इंद्रधनुष की तरह दिख रहा है। वह चौंकी और तुरंत आसमान की ओर अपनी गर्दन उठाई-इंद्रधनुष! अरे वाह! ये तो महानगर में बरसों से नहीं देखा।
काश बचपन के वो दिन कभी लौट पाते। काश घर के पास पोखर, बरगद के पेड़ और छतों पर नालियां होतीं, जिनमें कागज के जहाज और बारिश का समुंदर बनाया जा सकता।
हम आप सभी के आभारी हैं आपके कमेंट तो देख नहीं पढ़े मगर संख्या 41 दिख रही है हृदय से आभार
बहुत उम्दा लेखनी और बहुत ही प्यारी कहानी बचपन के खेल और बड़े होने पर ज़िंदगी की भाग दौड़ को बख़ूबी दर्शाया गया है। जो इस कहानी को और खूब सूरत बनाती है। बहुत खूब।
Thanks 🙏