
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
त्यौहार … यानी खुशी।
वह विशेष दिन, जो चाहे हमारा हो या किसी और का, अपने साथ उल्लास, उमंग और अपनापन लेकर आता है। हर धर्म, हर समाज में त्यौहार मनाने की अपनी-अपनी परंपराएँ हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं। इन परंपराओं में केवल आस्था ही नहीं, बल्कि आपसी सौहार्द और सामूहिक आनंद की भावना भी समाहित होती है।
आज के समय में त्यौहारों की चहल-पहल उनके आने से पहले ही सोशल मीडिया पर दिखाई देने लगती है। पोस्ट, तस्वीरें, शुभकामनाएँ…सब कुछ मानो उत्सव की भूमिका रच देता है। वास्तव में सोशल मीडिया भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक सशक्त और स्वतंत्र माध्यम है। यदि इसका उपयोग सही और सकारात्मक ढंग से किया जाए, तो यह समाज को रंग-बिरंगे फूलों की तरह एक सुंदर माला में पिरो सकता है।
परंतु जैसे ही फूलों के रंग, आकार या खुशबू पर प्रश्न उठाए जाने लगते हैं, वही माला बिखरने लगती है। किसी को गुलाब प्रिय है, तो किसी को मोगरा या चमेली। हर फूल की अपनी अलग पहचान, अपनी अलग सुगंध और अपना विशेष गुण-धर्म होता है। किसी भी फूल को कमतर ठहराने का हमें कोई अधिकार नहीं। विविधता ही तो प्रकृति की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
विरोधाभास हर जगह है और प्रकृति स्वयं विरोधाभासी तत्वों को साथ लेकर चलती है। दिन-रात, धूप-छाँव, ग्रीष्म-वर्षा सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी संतुलन बनाए रखते हैं। जब प्रकृति ऐसा कर सकती है, तो फिर हम क्यों नहीं? जिसे जो पसंद है, उसे वह करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए बस इतना ध्यान रहे कि हर चीज मर्यादा में हो।
हमें फुलवारी से सीख लेनी चाहिए, जो विभिन्न प्रकार के फूलों को अपने भीतर समेटकर, और भी अधिक सुंदर बन जाती है। बागबान भी सब फूलों की देखभाल निष्पक्ष भाव से करता है.बिना भेदभाव, बिना तुलना।
कहने का तात्पर्य यही है कि किसी की खुशियों में बाधक बनने के बजाय, उनमें सहभागी बनें। हर व्यक्ति को अपने ढंग से जीने दें, अपनी खुशियाँ मनाने दें। अंततः जीवन का एक ही सरल और मानवीय सिद्धांत है.
“जियो और जीने दो।”