
कृष्णा तिवारी कृति, प्रसिद्ध लेखिका, बिरलाग्राम नागदा जं.
चढ़ाते रहे उसे
मनौती की
निसरनियों पर।
मैं उतरती रही
दुत्कार की सीढ़ियों से।
अपने ही घर में कैसे
पराई होती हूँ मैं?
फिर,
अभ्यस्त होने लगा मन
गैरपन की उस
पीड़ा को,
ब्याह दिया
घने कुहासों में,
एक धुंध से निकलकर
दूसरी धुंध में,
जहाँ वर्जनाओं
में बहती रही
निर्बाध, अक्षुण्ण-सी,
मानो कामनाएँ
खेलती रहेंगी
अंत तक,
अलनी चलनी।
मेरा घर कौन-सा…?

बहुत मार्मिक कविता
मार्मिक 😔