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मेरा घर कौन-सा…?

यह कविता एक स्त्री की आत्मसंवेदना और उसके भीतर के संघर्ष का मार्मिक चित्रण करती है। वह बताती है कि कैसे समाज और परिवार की परंपराओं के बीच जीते-जीते वह स्वयं अपने ही घर में पराई बन जाती है। मन की पीड़ा इतनी गहरी है कि वह धीरे-धीरे उस “गैरपन” की स्थिति की अभ्यस्त हो जाती है — जैसे किसी ने अपनी पहचान को कुहासे में ब्याह दिया हो।
कविता में “एक धुंध से निकलकर दूसरी धुंध में” जाना, जीवन की निरंतर उलझनों और अस्पष्टताओं का प्रतीक है। वर्जनाओं से घिरी हुई स्त्री फिर भी अपनी “कामनाओं” को निर्बाध बहने देती है, क्योंकि वही उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। अंत में “मेरा घर कौन-सा…?” यह प्रश्न केवल भौतिक घर का नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और आत्मीयता की खोज का प्रतीक बन जाता है। यह कविता स्त्री-मन की उस पीड़ा को उजागर करती है, जो प्रेम, संबंध और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपनी पहचान तलाशने का प्रयास कर रही है।

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