देखा मैंने
नागफनी की रूखी शाख़ पर
पहला फूल
खिलता हुआ…
और मन में एक लहर
धीरे-धीरे उतरती चली गई
लगी जैसे
तुम्हारे स्वेत-श्याम जीवन के भाल पर
सुर्ख शिल्पा बिंदी
चमक उठी हो
जैसे बरसों की बारिश के बाद
आसमान में
इंद्रधनुष उतर आया हो।
पर तुम…
तुमने यह कठोर आवरण
क्यों ओढ़ रखा है?
मेरी आँखों ने तो देखा है
तुम्हारे भीतर…
मुस्कान का पहला अंकुर,
उसका एक नन्हा पल,
और एक बीज
धीरे-धीरे साँस लेता हुआ।
उस बीज को
पलने दो
खिलने दो
फूलने दो
फलने दो
अगर ऐसा नहीं करोगी
तो यह अपराध
भ्रूणहत्या कहलाएगा।
हाँ, यह अलग बातहै
वह भ्रूण नौकरीपेशा है,
पर काँटों के जंगल में भी
फूल की आस लगाता है।
और सुनो
यही तुम्हारा बीज,
यही तुम्हारा भ्रूण
नागफनी में
सुगंध बिखेर देगा।
बिखर जाओ
क्योंकि समेटने को
यह दिल—
अब भी
बाहें पसारे खड़ा है।

सवितासिंह मीरा, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

वाह अनुपम सृजन