खाने की पसंद-नापसंद: स्वाद से ज़्यादा मन का खेल

हम सभी ने कभी न कभी यह अनुभव किया होगा. किसी खास खाने को बार-बार देखने या दूसरों से उसकी तारीफ सुनने के बावजूद उसे पसंद नहीं कर पाना. हाल ही में मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. ऑफिस के सहकर्मियों के साथ पांचाली रेस्टारेंट में लंच के दौरान दो साथियों ने मशरूम डिश की बहुत तारीफ की. सबने आग्रह किया कि मैं भी एक बार टेस्ट करूं. लेकिन मन ने साफ मना कर दिया. न मैंने कभी मशरूम खाया, न मटन या फिश. और न ही इन चीजों को खाने की इच्छा हुई. सवाल उठता हैआखिर ऐसा क्यों होता है?
बचपन की परवरिश और स्वाद की परंपरा
हमारा स्वाद बचपन की थाली में तय हो जाता है. जिस परिवार में जो चीजें बार-बार परोसी जाती हैं, वह स्वाद मन में घर कर जाता है. यदि बचपन में मशरूम या नॉनवेज भोजन की आदत नहीं बनी हो तो बड़े होने पर उसे खाने की रुचि भी स्वाभाविक रूप से विकसित नहीं होती. भोजन सिर्फ शरीर की ज़रूरत नहीं, यह संस्कृति और सामाजिक सोच का भी हिस्सा है. कई समाज या परिवार किसी खास खाने को वर्जित मानते हैं. ऐसे में हम बचपन से ही अनजाने में कुछ खाद्य पदार्थों को अपने स्वाद से बाहर कर देते हैं, भले ही वह सेहतमंद या लोकप्रिय क्यों न हो. कई बार हम बिना चखे ही किसी चीज को पसंद या नापसंद कर लेते हैं. मशरूम को फंगस, मांस को मांसाहार मानकर मन पूर्वग्रहित हो जाता है. दिमाग यह फैसला खुद ही ले लेता है कि उसे क्या पसंद है और क्या नहीं.
खाने की सिर्फ स्वाद नहीं, गंध और बनावट भी बड़ी भूमिका निभाते हैं. मशरूम या मटन की खास गंध या टेक्सचर मन को अजीब लग सकता है. इससे न सिर्फ स्वाद, बल्कि मन में अरुचि का भाव बन जाता है.
शरीर का प्राकृतिक रुख
हर शरीर का अपना स्वाभाविक स्वाद और प्रतिक्रिया होती है. कई बार शरीर अनजाने में ही किसी चीज़ को अस्वीकार करता है. यह पूरी तरह सामान्य प्रक्रिया है और इसका कोई सीधा तर्क नहीं होता.
खाने की पसंद-नापसंद सिर्फ स्वाद की कहानी नहीं है. इसमें हमारी परवरिश, संस्कृति, सामाजिक माहौल और शरीर की प्रतिक्रिया का बड़ा योगदान है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जबरदस्ती स्वाद बदलना या दूसरों के दबाव में आना जरूरी नहीं. भोजन का चुनाव आपका निजी अधिकार है और यही विविधता इंसानी जीवन को खूबसूरत बनाती है.

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे

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