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लव यू….टेक केयर

सौरभ और स्वाति… दो शहर… दो ज़िंदगियाँ… और एक अनकहा रिश्ता।

वो न किसी पार्क में मिले, न किसी कॉफ़ी शॉप की हसीन यादें थीं। न कभी किसी स्टेशन पर इंतज़ार किया, न किसी शाम को हाथ थामकर टहलने का मौका मिला। लेकिन फिर भी… कुछ था जो दिल के बहुत भीतर तक उतर चुका था।

सौरभ दिल्ली में था, स्वाति पुणे में। दोनों का बचपन किसी छोटे से मध्यप्रदेश के कस्बे में बीता था। वही गाँव की मिट्टी की खुशबू, वही तीज-त्योहार की यादें… शायद यही पहली डोर थी जिसने उन्हें जोड़ा था।
फेसबुक पर जुड़ते ही दोनों की बातें बहने लगीं — किताबें, कविताएँ, फोटोग्राफी, शहर की यादें, कॉलेज की शरारतें… हर बात में मानो कोई अनकहा अपनापन था।

कभी-कभी बातें घंटों होतीं… कभी महीनों तक नहीं। फिर भी दिल के किसी कोने में एक उम्मीद रहती, “कभी तो फिर बात होगी।”

साल बीतते गए… जीवन की भागदौड़ में कई बार संवाद छूटता रहा। लेकिन एक रिश्ता, बिना शब्दों के भी दिलों में सांस लेता रहा।

फिर वो दिन आया… जब दुनिया थम गई। सौरभ अकेला अपने गाँव में कोरोना से जूझ रहा था। चारों तरफ खौफ था। किसी को किसी का हाल नहीं था। लेकिन तभी एक मैसेज आया…
“कैसे हो सौरभ? ख्याल रखना, ये वक़्त बहुत डरावना है।”

बस… उस एक मैसेज ने जैसे वीराने में फूल खिला दिया। दिन बीतते गए… स्वाति हर रोज़ उसका हाल पूछती, दवाइयों की याद दिलाती, डांटती भी थी, प्यार से समझाती भी थी। सौरभ के लिए ये महज़ शब्द नहीं थे… ये जीवन की डोर थी, जो उसे गिरने नहीं दे रही थी।

वो दौर बीता… लेकिन दिल में कुछ बचा रह गया था। एक एहसान नहीं… एक एहसास। एक ऐसा एहसास जिसे शब्दों में बाँधना मुश्किल था।
सौरभ ने अपने मन की बात शब्दों में पिरो दी… एक ख़त की शक्ल में… जिसे भेजते हुए उसके हाथ काँप रहे थे, दिल थरथरा रहा था।


प्रिय स्वाति,

कभी-कभी लगता है… काश मैं शब्दों से आगे बढ़ पाता… पर मैं जानता हूँ, कुछ भावनाएँ सिर्फ शब्दों में ही जीती हैं।

तुमसे कभी मिला नहीं… तुम्हें कभी देखा नहीं… लेकिन फिर भी, मेरी सबसे सच्ची मुस्कान तुम्हारे नाम से जुड़ी रही।
कभी तुम्हारी तस्वीरों में तुम्हारा मासूम सा चेहरा दिखा… कभी तुम्हारी किताबों के पोस्ट में तुम्हारा समझदार मन। और उन छोटी छोटी फिक्र भरी डांटों में… मुझे माँ जैसा अपनापन भी दिखा।

वो दौर जब चारों तरफ मौत का सन्नाटा था… मैं टूट रहा था… बिखर रहा था। तब तुम एक अनदेखी किरण बनकर मुझ तक पहुँची।
तुमने मेरा हाथ नहीं थामा, लेकिन मेरे दिल की गिरहों को सहलाया। मुझे भरोसा दिलाया कि मैं अकेला नहीं हूँ। तुम नहीं जानतीं, लेकिन तुम्हारे शब्दों ने उस वक़्त मुझे जीवन से जोड़े रखा।

शायद तुम्हें लगता है… मैं मज़ाक करता हूँ, छेड़ता हूँ… पर सच्चाई ये है… मैं खुद को तुम्हारे शब्दों में सहेज कर रखता हूँ। मैं तुम्हारे दोस्त में माँ की ममता पाता हूँ, बहन की फिक्र पाता हूँ… और… दिल के किसी सबसे कोमल कोने में एक ऐसी प्रेमिका का एहसास करता हूँ… जो कभी मिली नहीं, पर हमेशा पास रही।

ये ख़त मोहब्बत का इज़हार नहीं… बस उस बंधन की पहचान है जो नाम से परे है। मैं तुमसे कोई वादा नहीं चाहता… कोई रिश्ता नहीं चाहता… सिर्फ तुम्हारा साया अपने दिल में बसाए रखना चाहता हूँ।

क्योंकि… तुम ही वो “एक” हो… जिसे मैं ज़िन्दगी भर याद रखना चाहता हूँ।


स्वाति ने वह ख़त बार-बार पढ़ा। हर बार उसकी पलकों के नीचे एक गीला सा पर्दा उतर आता। शब्द उसे चीरते रहे… उसका मन हिला देते रहे। शायद इसलिए नहीं कि किसी ने उसे चाहा था… बल्कि इसलिए क्योंकि कोई था जिसने बिना माँगे, बिना शर्त… उसे सम्मान दिया था… इज़्ज़त दी थी।

उसने बस इतना जवाब दिया…

“सौरभ… रिश्ता कभी दूरी से नहीं, दिल से बनता है। जो तुमने मेरे लिए महसूस किया, वो मेरी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत सम्मान है। मैं हमेशा तुम्हारी दोस्त थी… और रहूँगी। हम दोनों की दोस्ती ही इस जीवन की सबसे प्यारी कहानी है।”

सौरभ की आँखें भीग गईं। शब्दों के उस पार… एक अधूरी सी लेकिन सबसे खूबसूरत कहानी लिख दी गई थी।

कुछ कहानियाँ पूरी नहीं होती… पर दिल में हमेशा जिंदा रहती हैं।

रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध कहानीकार, इंदौर

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