
रीदारा
जाने के पहले
ना जाने क्यों
ख़त्म करना ज़रूरी लगता है
वो सारे राज़,
जिनसे
दबी-छिपी बातें
पहचाने जाने का होता है डर।
वो अतीत की ज़हरीली भाषा,
बेहूदे कर्मकांड,
छिपी हत्याएँ,
बिखरी पड़ी घटनाएँ,
जिनसे
पहचान न ली जाए कहीं… नीयत।
और बहुत ज़रूरी हो जाता है
सारे भेद छिपाना।
वैसे मरने से पहले
कुछ भी
ख़त्म नहीं कर पाता कोई।
इतिहास में हौले-हौले दर्ज़ होता हुआ
अतीत का कच्चा चिट्ठा,
लौटता नहीं कुछ भी वापस,
कुछ डिलीट भी नहीं होता।
बस ख़त्म होता है ये जीवन
दोबारा न लौटने के लिए।
