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प्रेम के अवसर

प्रसिद्ध लेखिका रोली अभिलाषा की लंबी कहानी का पहला भाग

रोली अभिलाषा

सोई में हाथ इतनी जल्दी-जल्दी चलाए कि आटे का कनस्तर नीचे आ गिरा। विद्या ने पीछे मुड़कर देखा। ‘चलो, अच्छा है। आटा दो वक्त भर का ही था। आज 29 तारीख है। कल तो पैसा मिल ही जाएगा। कितना अच्छा हो, अगर हर महीना फरवरी हो।’ विद्या के मन में कुछ अलग ही भाव फूट रहे थे।

“तुम छोड़ दो, हम देख लेंगे,” गोविंद ने विद्या को ऊँचे स्वर में आवाज देते हुए कहा। वह जानता था कि जल्दबाजी में कुछ गिर गया है। विद्या के जाते ही वह सब समेट लेगा। जमीन पर घिसटते हुए कितने ही काम निपटा आता है। विद्या के जाने के बाद दो घंटे तक तो नन्हा भी सोया ही रहता है। उसके जागते ही गोविंद को जैसे स्वर्ग मिल जाता है। सबसे पहले तो बोतल से दूध पिलाना, फिर नैपी बदलना। थोड़ा-बहुत खिलाना और थपकियों से सुलाना।

यूँ भी अकेलापन काटने को दौड़ता है उसे। वह चाहता है कि विद्या उसके आसपास रहे। काम पर जाना मजबूरी है, मगर जब तक घर में है, वह साये की तरह उसके साथ रहे। इतने ही दिनों में गोविंद यह भी समझने लगा है कि विद्या को भी तो घर इसी तरह काटने को दौड़ता होगा। उसको भी तो अकेलापन सालता होगा। वह दे ही क्या पाया उसे? किसी तरह पेट भरने को अन्न और गोद में खेलता नन्हा शिशु, जिसके साथ चली आईं ढेर सारी जिम्मेदारियाँ। मगर विद्या ने कभी कोई शिकायत नहीं की।

जिस तरह आज हम उसके जाने के बाद से उसके आने तक बस उसे ही याद करते हैं, वह भी तो हमको याद करती होगी। आज गोविंद का मन कचोट रहा है कि वह विद्या को प्रेम करने के सारे अवसर खोता आया है। जब-जब विद्या को गोविंद की बहुत जरूरत हुई, तब-तब वह काम के बहाने ही सही, उससे दूर ही रहा।

सात महीने का पेट लेकर गली-गली भटकी थी विद्या उसके साथ, एक कमरे की तलाश में। बाबूजी की खीझ अम्मा ने विद्या पर उतार दी थी। मजबूरन घर छोड़ना पड़ गया। अम्मा-बाबूजी दरवाजे पर एकटक देखते रहे, लेकिन किसी ने आगे बढ़कर रोका नहीं था। रोकता भी कौन? निठल्ले बेटे और लापरवाह बहू का तमगा लेकर हम यहाँ तक आए। अगर बड़ी जीजी ने यह कमरा न दिलवाया होता तो सड़क पर ही दिन काटते। जीजी ने कमरा दिलवाया, साथ ही काम भी।

“हमें पता है, तुम हमको बुलाना चाह रहे थे, पर क्या करें, सुबह का समय तो जैसे पंख लगाकर उड़ जाता है,” विद्या आँगन में आते ही बोली।

“दुःख के दिनों को पंख काहे नहीं लग जाते, विद्या?” गोविंद उसके घुटनों पर सिर रखते हुए बोला।

“यह भला कौन कहता है? जो आज है, वह कल थोड़ी रहेगा,” विद्या एक बोतल में अपनी छाती का दूध भरते हुए बोली।

हर दिन की तरह आज भी विद्या को ऐसा करते देखकर उसने अनदेखा किया। कितनी ही मौतें मरता है वह हर रोज। कैसा अभागा पिता है कि अपनी ही औलाद से माँ की छाती से लगने का हक छीनता है। अपनी ही पत्नी की ममता का गला घोंटने का कारण बनता है। यह सब देखकर उसे अपने खुद के अपाहिज होने का दर्द नहीं सालता, बल्कि इन उत्तरदायित्वों को पूरा न कर पाने की टीस नासूर की तरह चुभती है। बस अपाहिज ही होता तो कोई भी पेट भरने को दो रोटी पलंग पर पड़े-पड़े दे ही देता, पर वह तो एक अपाहिज पति और नन्हे दुधमुँहे का अपाहिज पिता भी है। इन संबंधों की संज्ञा उसके उचाट मन को भरने की बजाय उद्वेलित करने का काम कर रही है।

“चिंता न करो, एक दिन सब ठीक हो जाएगा। भगवान है न, सभी की सुनता है, हमारी क्यों नहीं सुनेगा?” विद्या ने उसके बालों में उँगलियाँ फिराते हुए कहा।

जब भी गोविंद को मायूस देखती है, उसका दुख दो गुना हो जाता है। कहने को तो घर से बाहर निकलकर मन बहल जाता है, मगर विद्या का मन तो गोविंद और बच्चे के पास ही टहलता रहता है। मजबूरी न होती तो क्या विद्या बाहर निकलने का सोचती भी?

शादी के पहले जब भी गोविंद और विद्या की मुलाकात होती, हर बार वह एक बात जरूर कहता था, ‘दुनिया को दिखा देंगे कि पत्नी की जगह पैरों में नहीं, दिल के पास होती है। पति-पत्नी की जोड़ी राम-सीता की तब बनती है, जब पत्नी पति के कंधे से कंधा मिलाकर चले।’

गोविंद ने अपनी सभी बातें पूरी भी कीं। विद्या को वह मान-सम्मान दिया, जिसकी वह हकदार थी। यह अलग बात है कि प्रेम विवाह का ताना देकर गोविंद के माता-पिता ने उसे जलील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

“हमको इस बात का बहुत दुख है, विद्या, कि हम तुमको कोई भी खुशी न दे पाए। जितने दिन परिवार में रहे, ताने मिले और जैसे ही परिवार छोड़ा, कभी पेट को निवाला न गया तो कभी निवाले के लिए तुम्हें दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं।”

कहते हुए गोविंद के चेहरे पर बेहद मायूसी झलक रही थी। इस पर विद्या ने उसके होंठों पर उँगली रख दी और चुपचाप उसे निहारने लगी, मानो उससे कह रही हो कि इसके आगे एक भी शब्द नहीं सुन पाएगी।

गोविंद जानता है कि विद्या उससे बेइंतहा प्रेम करती है, वह कुछ न भी कहे तब भी। विद्या जानती है कि गोविंद का प्रेम ही उसकी मायूसी को और बढ़ाता है। हम जिससे बहुत प्रेम करें, उसे दुखी नहीं देख सकते और जब उसके दुख का कारण खुद को मानने लगें, तब तो जीना ही मुश्किल हो जाता है। ऐसे ही पलों में प्रेम को प्रेम करने का मन नहीं करता। सामने वाला कितने भी जतन कर ले, पर वह प्रेम खुद को ही एक ऐसा बोझ लगने लगता है, जिसे दूसरा अपने कंधे पर ढो रहा है। प्रेम का स्वावलंबी होना भला इस फजीहत को कैसे स्वीकारे?

गोविंद हर पल तिलमिलाता है, कसमसाता है। क्या पड़ी थी भगवान को जो यह पैर छीन लिया? इससे तो अच्छा था कि उसको ही उठा लेते। थोड़े दिन विद्या रोती, फिर सब कुछ बिल्कुल ठीक हो जाता।

“हमको पता है, तुम क्या सोच रहे हो। इतना न सोचा करो। कभी-कभी लगता है, अगर कागज-कलम हाथ में ले लो तो एक किताब ही लिख डालोगे।”

विद्या ने गोविंद के अंतर्मन के भाव को शब्द दे दिए। गोविंद चुप ही बैठा रहा।

“अच्छा सुनो, अब क्या हम इतने बूढ़े हो गए कि तुम पहले जैसे प्यार नहीं करते हमको? पहले तो बस मौके ही ढूँढ़ा करते थे। याद है, एक बार बाहों में भर लिया तो चूमकर ही छोड़ा था। कोई देखता है तो देखता रहे।”

गोविंद ने खुद को विद्या से अलग कर लिया। विद्या ने तो बस उसे सामान्य करने के लिए प्रेम की वही पुरानी लय छेड़ी थी, लेकिन शायद गोविंद को अच्छा नहीं लगा। विद्या ने गोविंद की ओर बढ़ती अपनी हथेली पीछे करते हुए मुट्ठी भींच ली। ‘क्या हो गया इन तीन ही सालों में?’ सोचते हुए विद्या की आँखों में आँसू भर आए। चाहकर भी वह इन्हें गिरा न सकी। कहीं गोविंद देख न ले!

गोविंद विद्या की उदासी भाँप गया। वह उसे इस तरह घर से भेजना नहीं चाहता था।

“आज खाने में क्या बनाया है?”

पीछे हटी हुई विद्या ने चौंककर गोविंद को देखा और खुद को सँभालते हुए बोली, “तुम्हारे मनपसंद मेथी के पराठे और अब गोभी का अचार भी तैयार हो गया है। खाकर देखना, बहुत अच्छा लगेगा।”

“हाँ, पता है हमें। शादी से पहले हम इस खाने को अनाप-शनाप कहते थे।”

गोविंद की इतनी-सी बात सुनते ही विद्या भागकर एक प्लेट में दो पराठे और अचार ले आई। उसका इतनी सुबह खाने का मन नहीं करता, लेकिन फिर भी आज उसका मन हुआ कि गोविंद के साथ बैठकर खाए। शायद इसी तरह गोविंद को कुछ अच्छा लगे, वरना तो काम पर जाने से पहले इतनी उलझन रहती है उसे। पेट में जाने कितनी मरोड़ उठ जाती हैं अपने बच्चे को छोड़कर जाने में।

गोविंद ने पहला कौर विद्या को खिलाया।

“हाँ, आज लग रहा है कि तुम मुझे अब भी पहले जैसा प्रेम करते हो,” कहते हुए विद्या ने अपना पहला कौर गोविंद को खिला दिया।

दोनों के ही मन भरे हुए थे। आँखें छलछलाईं, मगर दोनों ने खुद को सँभाल लिया। इधर-उधर की बातें करते रहे। सारी तैयारी करने के बाद विद्या ने बाहर निकलते हुए कुंडी लगा दी।अब रह गए गोविंद और नन्हा। गोविंद कभी नन्हे का मुँह देखता तो कभी खुले हुए आसमान की तरफ। ‘कहाँ बैठा होगा उसका भगवान?’ बस यही सोचता रहता।

किस घड़ी में घर से निकला था कि एक्सीडेंट में अपना पैर ही गँवा बैठा। विद्या ने उस दिन गरम पराठे परोसते हुए बहुत जबरदस्ती की थी, ‘खा कर ही जाना घर से, खाली पेट नहीं निकलते।’ मगर वह जानता था कि समय पर नहीं पहुँचा तो मैडम चाबी लेकर निकल जाएँगी और फिर अगले दिन उसे डाँट लगाएँगी। वह घर से निकल गया। समय पर पहुँचा भी नहीं। जाने ईश्वर ने वह एक क्षण गोविंद के जीवन में आने ही क्यों दिया। आज विद्या को भी तो देर हो रही थी, लेकिन गोविंद के लिए वह रुकी और उसने साथ में खाया भी। बस यही अंतर होता है एक स्त्री और एक पुरुष में। स्त्री पुरुष का मन रखने के लिए हर पल तैयार रहती है, कुछ भी कर गुजरने को, लेकिन पुरुष स्त्री का मन रखने को अपनी हीनता समझता है।

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