
पूनम सिंह
मैं यह चाहता हूँ…
मैं वह चाहती हूँ…
मुझे यह पसंद है…
मुझे वह पसंद है…
कहने वाले लोग
कभी यह क्यों नहीं सोचते—
कि उसे क्या पसंद है?
वह क्या चाहता है?
हर चाहत का केंद्र
सिर्फ़ ‘मैं’ ही क्यों हो?
कुछ पाने की इच्छा
सिर्फ़ अपने लिए ही क्यों हो?
कभी किसी और की पसंद को
अपनी खुशी से ऊपर रखकर देखिए…
कभी किसी की अनकही इच्छा को
बिना कहे समझकर देखिए…
क्योंकि प्रेम और अपनापन
सिर्फ़ यह कहने में नहीं कि
“मैं क्या चाहता हूँ…”
बल्कि कभी यह पूछने में भी है—
“तुम क्या चाहती हो?”
शायद रिश्तों की सबसे सुंदर शुरुआत
यहीं से होती है…
जहाँ ‘मैं’ थोड़ा पीछे हटता है
और ‘तुम’ को जगह मिलती है।
