gulmohar

बस यूँ ही…

प्रेम केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अस्तित्व, स्वतंत्रता और भावनाओं का सम्मान करने का नाम है। रिश्तों में विश्वास, संवाद और आत्मसम्मान ही सच्चे प्रेम की बुनियाद हैं। रिश्तों में प्रेम, विश्वास और सम्मान क्यों ज़रूरी है?

डॉ० दीपा प्राध्यापिका, दिल्ली विश्वविद्यालय

पुरुष को ऐसा क्यों लगता है कि यदि वह स्त्री को ज़्यादा प्यार और परवाह दिखाएगा, तो वह सिर पर चढ़ जाएगी? माता-पिता जब बच्चों पर अपना प्रेम उड़ेलते हैं, तो वे एक पल के लिए भी ऐसा नहीं सोचते। उनकी परवरिश और परवाह में वे अपना सर्वस्व लुटा देते हैं।

दूसरी ओर, स्त्री हर वक़्त पुरुष की उपस्थिति अपने इर्द-गिर्द क्यों चाहती है? वह क्यों भूल जाती है कि वह पुरुष की प्राथमिकता हो सकती है, किंतु पुरुष का भी अपना अस्तित्व, अपना जीवन और अपना स्पेस है। उसे भी तो कुछ अधिकार हैं, कुछ लम्हे अपने लिए, अपने अनुसार जीने के।

रिश्ता बाँधकर रखने का नहीं, स्वच्छंद छोड़ने का नाम है। दोनों के अस्तित्व को समझकर, एक-दूसरे पर विश्वास करने और सम्मान देने का नाम है। एक-दूसरे की ज़रूरतों को समझने, हर हालत में साथ खड़े रहने और साथ होने का एहसास दिलाने का नाम है। एक-दूसरे से पीठ फेरकर सोने या मुँह मोड़कर जाने का नाम नहीं।

प्रेम बिन कहे सब समझने का नाम है, एक-दूसरे को औकात के नाम पर ज़लील करने का नहीं। अच्छाइयाँ अगर स्वीकार की जाती हैं, तो बुराइयों को भी स्वीकारना होता है। बस, बुराइयाँ आपके आत्मसम्मान को हर रोज़ रौंदती न हों, आपके अस्तित्व पर प्रहार न करती हों।

जो लोग आपको बिना कहे, आपको देखकर, आपकी भावनाओं को समझकर भी नहीं समझते, ऐसे रिश्तों में आप अपने शब्दों या ख़ुद को कितना भी ज़ाया कर लें, वे नहीं समझेंगे।

प्रेम के साथ नाराज़गी और गुस्सा भी आता है। लेकिन गुस्से में यदि एक-दूसरे का सम्मान भूल जाएँ, अभद्र भाषा या शब्दों से एक-दूसरे को खंडित करके रख दें, तो साथ और दूरी में कोई ख़ास अंतर नहीं रह जाता। बेड सेपरेशन इसका अच्छा उदाहरण है।

साथ तो साथ होता है। दूर हों या पास, एक-दूसरे में ज़िंदा रहने का एहसास होता है। नाराज़गी में मनाने से कौन छोटा हो जाता है? वह, जिसके लिए रिश्तों से ज़्यादा ईगो महत्त्व रखता है। वरना प्रेम में तो अंतिम साँस तक तन-मन-धन, अपना सर्वस्व, एक-दूसरे के लिए ताक पर रख दिया जाता है।

घनानंद, बोधा और ठाकुर, सभी तो प्रेम से होकर गुज़रे। अपने प्रेम की पवित्रता से मीरा भक्तिन हो गईं। किसी ने प्रेम को मीन और जल के रूप में इंगित किया, किसी ने इसे सुई में से निकलने या तलवार की धार पर चलने जैसा बताया। कभी इस पर तीनों लोकों का राज़ त्यागने की बात की गई, तो कभी लोक-लाज, अहंकार—सब कुछ त्यागकर ही प्रेम की साधना में उतरने का मूलमंत्र बताया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *