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औरत का मायका: सामने होकर भी कितना दूर

मायके की याद और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच खड़ी एक भारतीय महिला जिम्मेदारियों के बीच कहीं पीछे छूट जाता है औरत के हिस्से का मायका और सुकून।

नम्रता (साक्षी) भवालकर

औरतों के हिस्से
मायका होकर भी नहीं आता।

दरवाजा तो सामने ही होता है,
पर बंद रहता है
सास-ससुर की देखभाल,
पति की थकान
और बच्चों के होमवर्क की
ज़िम्मेदारियों से।

माता-पिता बाट जोहते रहते हैं,
फिर खुद ही मन को समझा लेते हैं,
अब ये घर उसका नहीं,
अब वो घर उसका है,
तो ज़िम्मेदारी भी उसकी।

बेटी से बहू बनकर,
पत्नी होते हुए
कब माँ बन गई,
पता ही नहीं चला।

सुबह-सुबह
माँ के हाथ वाली चाय की प्याली,
अब उसके हाथ में
सास-ससुर की चाय,
पति का टिफिन बन गई है।

अब यंत्रवत हाथ चलते हैं
और अलसाई मायके की सुबह
भाग-दौड़ वाले दिन में
बदल गई है।

भूल गई है वह
मायके की मिट्टी की सौंधी खुशबू,
बालकनी में बैठकर
चाय की सुकून भरी
गर्म चुस्कियाँ।

हाँ, औरत लौटेगी
तब अपने मायके,
जब उसके छौने
नई ज़िंदगी की सुबह
ढूँढ़ने निकल चुके होंगे।

और जीवनसाथी
जीवन-संध्या में
उसके साथ बीते लम्हों की कसक
लिए बैठा होगा।

शायद तब भी
न लौट पाएगी वह
बंधनमुक्त होकर,
क्योंकि वह जन्म से लेकर
जीवन-संध्या तक
बंधन से मुक्त हो ही नहीं पाई है।

मुक्त होगी तभी,
जब उसे अनंत आकाश में
विलीन होना होगा।

और फिर ही
असीम शांति का
अनुभव होगा।

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