मिट्टी, गीत और आस्था से महकती कटनी की लोक-परंपरा

मध्य प्रदेश के हृदय में स्थित कटनी केवल चूना भट्टों और औद्योगिक हलचल का नगर नहीं, बल्कि यह वह भूमि है, जहाँ महाकौशल की संवेदनशीलता, बघेलखंड की लोक-आस्था और बुंदेलखंड की गीतमयता, तीनों का अद्भुत मिश्रण दिखाई देता है। यहाँ की संस्कृति मिट्टी की तरह सोंधी और लोकगीतों की तरह मधुर है।
इसी धरती पर दो त्योहार ऐसे हैं, जो इस क्षेत्र की आत्मा को स्वर देते हैं: अक्षय तृतीया, जो शुभ कार्यों के आरंभ का प्रतीक है, और ‘महामुलिया’ या ‘सँझा’, जो लोक-भक्ति, मातृत्व और बालसुलभ हर्ष का उत्सव है।
अक्षय तृतीया : सृजन और शुभ कार्यों के आरंभ का पर्व
जब बैसाख की दुपहरी में धूप तन को झुलसाने लगती है, तभी आती है अक्षय तृतीया, जिसे यहाँ के लोग आखा तीज भी कहते हैं। यह दिन बिना मुहूर्त के किए जाने वाले हर शुभ कार्य के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
सुबह-सुबह घरों में गौरी-गणेश की पूजा होती है। नई वस्तुएँ, नए बर्तन और नई फसल के बीज खरीदे जाते हैं। यह दिन सृजन और विश्वास का प्रतीक है, क्योंकि यहाँ हर शुभ आरंभ को ‘अक्षय’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो, अर्थात जो सशक्त रहे, कभी क्षीण न हो।
कटनी की गलियों में यह दिन दान की भावना से भी जुड़ा है। सड़क किनारे रखी मटकी में भरा पानी, पथिकों को दिया गया गुड़ और बच्चों की मासूम हँसी, सब मिलकर इसे सद्भाव का उत्सव बना देते हैं।
महामुलिया : बालमन, लोकभक्ति और उल्लास का पर्व
इसे कहीं-कहीं ‘सँझा’ भी कहते हैं। बालक-बालिकाओं को सृजन से जोड़ना इस लोकपर्व का मुख्य उद्देश्य है। मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान कोई बड़ा उत्सव या खुशी का आयोजन नहीं किया जाता, क्योंकि यह समय शोक का माना जाता है। इस अवधि में परिवार के लोग अपने पितरों की याद में विशेष पूजा और अनुष्ठान करते हैं। लेकिन कई सौ साल पहले बच्चों की खुशी और मनोरंजन के लिए महामुलिया उत्सव की शुरुआत की गई थी, ताकि वे भी इस समय में आनंद का अनुभव कर सकें। यह उत्सव विशेष रूप से बच्चों के लिए प्रारंभ किया गया, ताकि पितृपक्ष की गंभीरता के बीच वे कुछ खुशियाँ मना सकें।’महामुलिया’ पितृपक्ष के पंद्रह दिनों तक मनाया जाने वाला लोकपर्व है। यह त्योहार मुख्यतः बालिकाओं का होता है, पर इसमें पूरे मोहल्ले की सहभागिता होती है। छोटी-छोटी लड़कियाँ किसी सूखी काँटेदार डाल को मिट्टी से भरे कनस्तर में गाड़ती हैं। यही उनकी महामुलिया माता बनती है। वे उसे रंगीन पन्नियों, चूड़ियों, पॉपकॉर्न के हार और कागज़ी फूलों से सजाती हैं। हर शाम वे गोल घेरे में नाचती-गाती हैं। परिक्रमा के दौरान गीतों के बोल कुछ यूँ होते हैं:
“महामुलिया के दो-दो फूल खिलैयो, मोरी महामुलिया…”
गीत के साथ-साथ वे हाथों में मुरमुरे की कटोरी लेकर प्रसाद चढ़ाती हैं। कहीं-कहीं गोबर से भित्ति पर आकृतियाँ उकेरती हैं, पन्नी की कतरनों से सजावट करती हैं और मीठे खांड, चने तथा मुरमुरे खिलाती हैं।लोकगीतों की धुन पर वे थिरकती और गाती हैं:
“ज्योति की सास ने चुराया मेरा बटुआ… सोना ले ले, चाँदी ले ले, दे दे मेरा बटुआ…”फिर हर एक लड़की का नाम लेकर उसे छेड़ती हैं और वह शर्माती है।एक अन्य गीत की मधुर लय कुछ इस प्रकार है: “मैं तो गोबर लेकर सड़क पर खड़ी, मुझे बतला दो सँझा की गली। अजी वही है गली, अजी वही है गली, जहाँ इमली का पेड़ और अनारकली…”गीतों की लय में झूमती बालिकाओं का यह दृश्य एक साथ भक्ति, सौंदर्य और बचपन की मासूम हँसी से भरा होता है।
‘बौरा’ : मौन और मस्ती का प्रतीक
महामुलिया पर्व की यह एक और अनोखी परंपरा है—’बौरा’ बनाना। किसी एक छोटे लड़के को इस पर्व के अंतिम दिन ‘बौरा’ बनाया जाता है। उसे विशेष रूप से सजाया जाता है। कभी मक्के के फूलों से उसके सिर पर फूलों का मुकुट बनाया जाता है, तो कभी गले में मुरमुरों के हार पहनाए जाते हैं। जब बालिकाएँ गाते-बजाते देवी मंदिर की ओर जाती हैं, तो बौरा उनके साथ चलता है, पर उसे मौन रहना होता है। यह मौन उसकी भक्ति और संयम का प्रतीक माना जाता है।लोकविश्वास है कि यदि वह बोलेगा, तो उसकी बात में अपशकुन होगा। इसलिए सब उसे चुप रहने को कहते हैं।और यदि बाल-शरारत में बौरा बोल पड़े, तो लड़कियाँ हँसते हुए सांकेतिक पिटाई करती हैं। डाँट में भी ममता और हँसी में भी परंपरा की गूँज! यह दृश्य गाँव की गलियों में आनंद और एकता का रंग भर देता है।
अमावस्या पर विसर्जन : श्रद्धापूर्वक समापन
पंद्रहवें दिन, अमावस्या को, सभी बालिकाएँ अपने ‘महामुलिया’ को सजाकर, गीतों और ढोलक की थाप पर नाचती हुई देवी मंदिर तक पहुँचती हैं।वहाँ वे प्रसाद चढ़ाती हैं, देवी से आशीष माँगती हैं, फिर अपने ‘महामुलिया’ को तालाब या नदी में विसर्जित कर देती हैं। इस क्षण में आस्था, विदाई और उल्लास—तीनों एकाकार हो जाते हैं। सूखी डाल, जो पंद्रह दिनों से भक्ति में नहाई थी, अब जल में लौट जाती है—जैसे मिट्टी, जल और जीवन, सभी एक चक्र में बँध गए हों।
