
मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’
बूँदें बनकर जब गिरा, पानी का स्वरूप।
धरती आँचल खोलती, भर जाते सब कूप।
बादल विरह बिखेरता, लेकर मन में प्यार।
सूखी धरती ने कहा, आओ मेरे द्वार।।
विरह-वेदना साथ में, मेघ बरसते आज।
बूँद-बूँद में लिख रहे, धरती के मन-राज।।
पानी का स्वरूप
पानी का स्वरूप है सदैव शीतल बने रहना और शीतलता हमेशा सुकून का अनुभव कराती है।जल प्रकृति का दिया हुआ, हमारे जीवन में अमूल्य गुणों का अनुपम भंडार है। इसलिए इसे अमृत भी कहा गया है। अमृत का मतलब आप सब जानते हैं। प्यास से मरने वाले प्राणी को शीतल जल की कुछ बूँदें ही उसके प्राणों के लिए अमृत बन जाती हैं। तो हर प्राणी का फ़र्ज़ बनता है कि इस अमृत की महत्ता को समझते हुए इसे स्वच्छ और निर्मल रखें।यह तो आप सभी जानते हैं कि जल के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। जल, पृथ्वी पर रहने वाले प्राणियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण पेय पदार्थों में से एक है। पीने के अलावा कई उद्देश्यों के लिए उपयोग में आने वाला जल दैनिक जीवन में अति आवश्यक है।इसके बिना धरा पर कुछ भी संभव नहीं, जैसे साँसों के बिना इस देह का कोई महत्व नहीं।
जल का स्वभाव बिल्कुल माटी की तरह शीतल और निर्मल होता है। प्रेम की तरह इसका अपना कोई रंग नहीं होता। फिर भी अनेक रंगों में मिलकर भी अपना अस्तित्व नहीं खोता। सबमें घुलकर उसी रंग का हो जाता है। बर्फ के रूप में कुछ देर कठोरता ज़रूर अपनाता है, लेकिन तुरंत ही अपने मूल स्वरूप में पिघल जाता है। माँ के मातृत्व-सा कोमल… जिस तरह माँ का आँचल हमें स्नेह की तृप्ति देता है, उसी तरह जल भी धरा के हर प्राणी की प्यास बुझाकर मन को तृप्त कर देता है। फिर चाहे वह मनुष्य हो, पशु-पक्षी या जानवर।
जल की अपनी ही एक धुरी होती है। जब कुएँ तक सीमित होता है, तो आने वाले पथिकों को अपनी ओर आकर्षित करता हुआ बिना स्वार्थ के शीतल जल से उनकी प्यास बुझाता है। कुआँ बहुत गहराई लिए होता है, इसलिए इसका पानी भी मीठा होता है। गहरे कुएँ में रहने वाला जल हमें संदेश देता है—आप जितनी गहराई में जाएँगे, उतने ही मीठे होते चले जाएँगे।
वही जल जब नदी के रूप में निरंतर बहता है, तो हमें कोमल बने रहने का ज्ञान सिखाता है। कैसे नदी में उतरते ही छोटे-बड़े पत्थरों को भी प्रेम से सहलाता हुआ अपने कोमल स्पर्श से अनेक जीवों की तृप्ति का माध्यम बनता है। जब कभी घुटन भरे मन से आँखों की राह बूँद बनकर बहता है, तो सारे खारेपन को बाहर खींचकर हल्का महसूस कराता है।और जब बादलों से बूँद बनकर बरसता है, तो विरहिणी बने सूखे नदी-तालाबों को लबालब प्रेम से भरते हुए सुकून दे जाता है। उसी तरह सारे जलाशयों का वही जल समुद्र में मिलने पर खारा हो जाता है, क्योंकि समुद्र का अपना मूल स्वभाव खारा बना रहना है। समुद्र में चाहे कितनी ही नदियाँ अपने खुद के अस्तित्व को विलीन कर लें, लेकिन समुद्र के मूल स्वरूप को नहीं बदल सकतीं। उसको सिर्फ अपने मूल स्वभाव में ही रहना है। घर हो या बाहर, हर जगह हमें पानी की आवश्यकता होती ही है और इसी को पूरा करने के लिए नई-नई तरह की तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, ताकि हमें कभी पानी की कमी महसूस न हो और हर जगह हमें पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध हो सके। “पानी है तो सब हैं और पानी है तो हम हैं।”
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