
प्रदीप श्रीवास्तव, गोमतीनगर, लखनऊ
हर बार अनजाने शहर में
पहुँचता हूँ लोगों के बीच,
अनजान बनकर।
दिलों के रास्ते उतरकर
लोगों का अपना बनकर,
उस शहर को अपना बनाता हूँ।
और फिर चल देता हूँ
दूसरे अनजाने शहर को
अपना बनाने।
पहले होली, दिवाली ही अपनी थी,
अब लोहड़ी, बैसाखी भी
अपनी बन गई।
