
पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर
तुम मेरी ख़ामोशी को बख़ूबी पढ़ लेते हो,
मेरी आँखों के दर्द की गहराई समझ लेते हो।
अब क्या ही कहूँ तुमसे, तुम मेरे मन में हो,
मेरी हँसी के पीछे छिपे ग़म तुम पढ़ लेते हो।
अक्सर वक़्त के साथ सभी कुछ बदल जाता है,
तुम फिर भी कुछ अहसासों में मुझको छू लेते हो।
तुम मशग़ूल हो अपनी महफ़िलों की रौनक में,
फिर भी कभी-कभी मेरा ख़याल कर लेते हो।
तुम्हारी याद तो हरदम मेरे आस-पास रहती है,
तुम भी उदास रहने का दिखावा कर लेते हो।
तुम्हारी यादों को सहेज रखा है मैंने,
तुम भी होंठों पर झूठी मुस्कान सजा लेते हो।
मैं भी अब हर बात को वक़्त पर छोड़ देती हूँ,
तुम भी सबके सामने क्या-क्या बहाने कर लेते हो।
अजनबियों की तरह रहते हो बेशक तुम,
फिर भी अँधियारे में ‘पूनम’ समेट लेते हो।
