
मानसुरा बेगम, लखीमपुर
कभी पलास हमारे घर में भी गिरा था,
मेरे पिता ने अथाह पानी में डुबकी लगाकर
बिस्तर को ऊँचा किया था.
हमें ज़िंदा रखने के लिए
दिन-रात
पिता के माथे का पसीना
ज़मीन पर गिरता था.
जैसे कल की ही बात हो,
अब तीन दशक पुराने हो गए वे दिन.
राजमार्ग की दस टूटी सड़कें पार करके
हमारे लिए चावल लाते थे पिता.
हमारी बार-बार उमड़ती भूख की बाढ़ को
अपने कंधों पर ढोते हुए
वे हर बार किनारा बन जाते थे.
सागर जैसे ब्रह्मपुत्र की
विशाल लहरों और भँवरों के साथ
सह-अस्तित्व में जीना
हमारी नियति थी.
बार-बार काँप उठता था
मेरे पिता का मज़बूत दिल,
पर उस काँपने का एहसास
हमें कभी हुआ ही नहीं.
आधी रात की गर्म आहों के साथ
मेरे पिता जागते रहते थे,
हमारी सुरक्षा के लिए.
माजुली के नदी-किनारे के लोग हैं हम.
टूटने और बनने के बीच ही
जीवन हमारा.
यह पाठ
बचपन में ही सीख लिया था.
शिवसागर, चराइदेव की
महाप्रलय की बातें
भले ही इतिहास में दर्ज हों,
लेकिन हमारे लिए
हर बाढ़ की अपनी एक कहानी है,
अपना एक भय.
समय ने किसी को
मौका ही नहीं दिया
ऊँची ज़मीन पर बसने का.
बाढ़ से अनजान जीवन
हमारे हिस्से में कहाँ था?
कुछ भी तो नहीं बचा
लोगों के पास—
न खेती,
न संपदा.
प्रकृति के रोष में
कष्ट से घिरे हुए हैं हम.
फिर भी मन कहता है—
दिखौ शांत होगा,
प्रकृति का गुस्सा भी कम होगा.
इसी आशा में बँधी हूँ मैं.
सुबह-शाम की प्रार्थना में
बस यही कहती हूँ—
दिखौ शांत होगा…

बहुत मर्मस्पर्शी बाढ़ग्रस्त जगह का वर्णन