
रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
राधा-कृष्ण का प्रेम सांसारिक प्रेम से परे आध्यात्मिक प्रेम था।
राधा रानी और कृष्ण का प्रेम बिना किसी शर्त के भक्ति और पूर्ण समर्पण के प्रेम का प्रतीक था।
एक समय ऐसा आया जब भगवान कृष्ण को वृंदावन और अपनी प्रिया राधा को छोड़कर मथुरा जाना पड़ा।
जाने से पहले एक शाम कृष्ण यमुना तट पर विरह की धुन बजा रहे थे।
वंशी की धुन पर मोहित राधा, यमुना तट पर कान्हा के पैरों के पास, आँखें बंद किए संसार से बेखबर, मंत्रमुग्ध और भाव-विभोर बैठी थी।
“राधे..! किस संशय में हो?”
“आप तो मन की बात जानते हो, कान्हा..!”
“फिर भी कुछ तो कहो..!”
“मेरे प्रेम को भुला तो नहीं दोगे?”
“राधे..! हमारा प्रेम संसार से परे आध्यात्मिक है। देह से नहीं, आत्मा से है, जो अलौकिक है। हमारा प्रेम एक-दूसरे के प्रति समर्पण और त्याग की भावना से पूर्ण है, सांसारिक बंधन नहीं।
राधे..! फिर ये संशय क्यों?”
“कान्हा..! क्या आप एक वचन देंगे?”
“अवश्य राधे..! कहो।”
“कान्हा..! जब मैं अपने जीवन के अंतिम समय के निकट होऊँगी, तब एक बार मुझे दर्शन ज़रूर दोगे?”
भगवान कृष्ण के चेहरे पर मंद मुस्कान थी।
राधा रानी विस्मित नेत्रों से कान्हा को निहार रही थी।
मुस्कुराते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने इस वचन को प्रेम सहित स्वीकार किया।
तत्पश्चात श्रीकृष्ण मथुरा जाकर कंस का वध किया और रुक्मिणी संग विवाह किया।
अलौकिक द्वारका नगरी बसाई और कृष्ण कन्हैया द्वारकाधीश बन गए।
महाभारत युद्ध में उन्होंने अहम भूमिका निभाई और अर्जुन को जीवन के अमूल्य ज्ञान से अवगत कराया, अपने मुख में ब्रह्मांड का दर्शन कराया।
राधा रानी विवाह करके कृष्ण की प्रतीक्षा में अपने कर्तव्यों का पालन करती रही, किंतु कृष्ण के प्रेम को कभी हृदय से भुला न पाई।
अंत में वह समय आ गया, जब राधा अपनी वृद्धावस्था में थी। तब उसने कृष्ण का आह्वान किया।
भगवान कृष्ण भी अपनी राधा रानी का वचन पूरा करने के लिए राधा से मिलने आए।
राधा की अवस्था देखकर कृष्ण व्याकुल हो गए और उनसे वर माँगने को कहा।
परंतु राधा ने कुछ भी माँगने से इनकार कर दिया। वह जान गई थी कि कृष्ण भगवान हैं।
राधा मुस्कुरा रही थी।
राधा की अंतिम इच्छा तो पूर्व की भाँति बाँसुरी सुनने की थी।
श्रीकृष्ण अपनी प्रिया राधा की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रेम से बाँसुरी बजाने लगे।
बाँसुरी की धुन इतनी मधुर थी कि राधा कृष्ण के कंधे पर अपना सिर रखकर मुरली की मधुर धुन सुनते हुए अपने प्राण त्याग दिए।
राधा के प्राण त्यागते ही मुरली की मधुर धुन भी मंद हो गई।
राधा के चले जाने से कृष्ण बहुत आहत हुए।
कृष्ण ने राधा के प्रेम में अपनी प्रिय बाँसुरी तोड़ दी।
ऐसा कहा जाता है कि इस घटना के पश्चात कृष्ण ने बाँसुरी को कभी हाथ नहीं लगाया।
तब से ही राधा संग कृष्ण का नाम जुड़ गया
राधे-कृष्ण..!
आज भी मंदिरों में कृष्ण की प्रतिमा के साथ राधा रानी के दर्शन होते हैं।
