दोस्ती की वह छांव, जहां पूरा मोहल्ला एक परिवार बन गया

फ्रेंडशिप डे पर महिदपुर रोड के मोहल्ला परिवार के सदस्य एक साथ उत्सव मनाते हुए. महिदपुर रोड का मोहल्ला परिवार. जहां दोस्ती केवल रिश्ता नहीं, बल्कि एक जीवंत परिवार की पहचान है.

दिनेश मंडोवरा, वरिष्ठ पत्रकार, महिदपुर रोड

जीवन की लंबी यात्रा में हम न जाने कितने लोगों से मिलते हैं. कुछ चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं, कुछ नाम यादों में कहीं खो जाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी मिलते हैं, जो धीरे-धीरे हमारे जीवन का ऐसा हिस्सा बन जाते हैं कि उनके बिना हर खुशी अधूरी लगने लगती है. महिदपुर रोड का हमारा मोहल्ला परिवार भी मेरे जीवन की ऐसी ही अनमोल धरोहर है.

आज फ्रेंडशिप डे है. सुबह से ही मोबाइल पर शुभकामनाओं के संदेश आ रहे हैं, लेकिन इन संदेशों के बीच मन बार-बार उन्हीं चेहरों की ओर लौट जाता है, जिनके साथ बीते वर्षों की अनगिनत स्मृतियां जुड़ी हुई हैं. वे दोस्त, जो अब केवल दोस्त नहीं रहे, बल्कि परिवार बन चुके हैं.

यह किसी संस्था की कहानी नहीं है. यहां कोई संविधान नहीं, कोई चुनाव नहीं, कोई अध्यक्ष या सचिव नहीं. यहां केवल दिलों का रिश्ता है. ऐसा रिश्ता, जिसे निभाने के लिए किसी पद या पहचान की जरूरत नहीं पड़ती. हर व्यक्ति अपने आप में एक जिम्मेदारी है और हर मित्र दूसरे की खुशी का सहभागी.

कोरोना काल की कठिन घड़ियां शायद ही कोई भूल पाएगा. उस दौर में जब लोग एक-दूसरे से दूरी बना रहे थे, तब हमारे इस छोटे से मोहल्ले ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया. वहीं से शुरू हुआ यह सफर आज भी उसी आत्मीयता के साथ चल रहा है. समय बदल गया, लेकिन दोस्ती का रंग आज भी वैसा ही गहरा है. हमारी एक खूबसूरत परंपरा है. हर अमावस्या को हम सब बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के गौशाला पहुंचते हैं. गौसेवा करते हैं, कुछ समय साथ बिताते हैं और फिर चाय की प्याली के साथ जीवन की छोटी-बड़ी बातें साझा करते हैं. वहां कोई बड़ा नहीं होता, कोई छोटा नहीं होता. केवल अपनेपन की भाषा होती है.

हमारे यहां किसी का जन्मदिन हो, विवाह वर्षगांठ हो या कोई छोटी-सी उपलब्धि, पूरा मोहल्ला उत्सव बन जाता है. ढोल की थाप पर जब सभी मित्र और उनके परिवार एक साथ झूमते हैं, तब लगता है कि खुशियां बांटने से सचमुच कई गुना बढ़ जाती हैं.आज तक हमने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि कार्यक्रम का खर्च किसने उठाया, किसने कितना सहयोग दिया या किसने अधिक योगदान किया. किसी ने कभी हिसाब नहीं मांगा, क्योंकि जहां प्रेम का खाता खुल जाता है, वहां रुपयों का लेखा-जोखा अपना महत्व खो देता है. यही हमारी दोस्ती की सबसे बड़ी पूंजी है.

इस परिवार का स्मरण करते ही एक चेहरा अनायास आंखों के सामने आ जाता है—स्वर्गीय डॉ. आर. जी. गुप्ता. वे केवल हमारे मित्र नहीं थे, बल्कि हम सबको जोड़कर रखने वाली एक आत्मीय डोर थे. उनकी सहज मुस्कान, उनका स्नेह और हर कार्यक्रम में उनका उत्साह आज भी हमें भीतर तक छू जाता है. समय उन्हें हमसे दूर ले गया, लेकिन स्मृतियों से उन्हें कोई कभी अलग नहीं कर सकता. आज भी जब हम सब साथ बैठते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वे कहीं न कहीं हमारे बीच मुस्कुरा रहे हों.

इस मोहल्ला परिवार में हर क्षेत्र के लोग हैं. अशोक तलेरा अपनी सहजता से सबका हिसाब रखते हैं, कुलदीप सरदार और उनके पुत्र रमनसिंह मक्कड़ अपनी आत्मीयता से सबका मन जीत लेते हैं. अनिल आयुष, गोपाल उपाध्याय, सुनील सेठिया, राकेश सेठिया, शिक्षक अनिल सेठिया, राहुल जैन, नरेश सेठिया, सचिन सेठिया, दिलीप तलेरा, विद्यालय संचालक राकेश पंड्या, चंद्रशेखर पंड्या, संजय पंड्या, दैनिक भास्कर के दिनेश मंडोवरा, विजय पोरवाल अखिलेश पोरवाल , प्रकाश राठौर और ऐसे ही अनेक मित्र इस परिवार की पहचान हैं. अलग-अलग पेशे, अलग-अलग विचार, अलग-अलग जीवन, लेकिन दिल एक.

धीरे-धीरे हमारे परिवार भी इस दोस्ती का हिस्सा बन गए. अब किसी कार्यक्रम में केवल मित्र नहीं मिलते, बल्कि बच्चों की खिलखिलाहट, माताओं की मुस्कान और बड़ों का स्नेह मिलकर ऐसा वातावरण बना देते हैं, जहां हर मिलन किसी त्योहार से कम नहीं लगता.

आज जब दुनिया डिजिटल रिश्तों में उलझती जा रही है, तब महिदपुर रोड का यह मोहल्ला परिवार विश्वास दिलाता है कि सच्ची दोस्ती आज भी जिंदा है. वह दोस्ती, जो बिना किसी स्वार्थ के साथ चलती है. जो बिना बुलाए घर पहुंच जाती है. जो खुशी में सबसे आगे और दुख में सबसे पहले कंधा बनकर खड़ी हो जाती है.

फ्रेंडशिप डे पर ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि यह अपनापन, यह हंसी, यह साथ और यह विश्वास हमेशा यूं ही बना रहे. आने वाली पीढ़ियां भी जानें कि कभी एक मोहल्ला ऐसा था, जहां लोग केवल पड़ोसी नहीं थे, बल्कि सचमुच एक परिवार थे.

शायद इसी का नाम दोस्ती है… और शायद यही जीवन की सबसे बड़ी कमाई भी.

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