रेशम की डोरी..

डोरी से चलने वाला पारंपरिक झालरदार बीजना, जिसके नीचे गर्मी की दोपहर में परिवार सुकून से विश्राम कर रहा है।

निरुपमा सिंह, बिजनौर

साटन का मोरा बीजना
फिर याद आया वो,
बिना बिजली, बिना शोर
करने वाला झालरों वाला बीज़ना।

डोरी खींचे कोई कोने में
पंखा धीरे-धीरे डोल रहा
गर्मी की उनींदी दोपहरी में
सपनों का पंछी
हौले से कुछ बोल रहा।

चर्र-चर्र की मीठी ध्वनि में
बीते दिनों की वो गूँज देती सुनाई..
उस हवा में ठंडक ही नहीं,
घर-आँगन की ममता समाई।

घर के सभी सदस्य, उसके आगोश में..
करते शीतलता का अहसास
मिल-जुल कर भरपूर नींद
आती नैनन द्वार।

बिजली वाले युग में भी अब
याद बहुत वह पंखा आता,
जिसकी धीमी ठंडी लय में
पूरा बचपन झूला झूल जाता।

One thought on “रेशम की डोरी..

  1. बहुत सुंदर ढंग से लिखा है आपने अभी भी ये चल रहा है। जहां बिजली कम आती है,ग्रामीण अंचल में हमारे (यूपी)बलिया में इसे बेना कहते है।एक सत्संग में बिहार की महिलाएं लगभग लाखों की संख्या में लाई थी। आपने बचपन याद दिला और भी बहुत कुछ…🙏🙏

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