डोरी से चलने वाला पारंपरिक झालरदार बीजना, जिसके नीचे गर्मी की दोपहर में परिवार सुकून से विश्राम कर रहा है।

रेशम की डोरी..

आधुनिक बिजली के पंखों और एसी के दौर में भी कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो मन को बरबस अतीत में ले जाती हैं। यह कविता “साटन का मोरा बीजना” पुराने समय के डोरी से चलने वाले झालरदार बीजने, घर-आँगन की आत्मीयता, संयुक्त परिवार की मधुरता और बचपन की सुकून भरी दोपहरों का मार्मिक चित्रण करती है।

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