तुम, मैं… खजुराहो

राघव और रिद्धिमा खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर के सामने खड़े, पृष्ठभूमि में भव्य मंदिर और सुनहरी रोशनी। राघव और रिद्धिमा खजुराहो के कंदारिया महादेव मंदिर के सामने

सुरेश परिहार, पुणे

रिद्धिमा की एक आदत है. वह किसी भी बात को सिर्फ इसलिए सच नहीं मानती है क्योंकि लोग उसे बार-बार दोहरा रहे हैं. वह सुनती थी, पढ़ती थी, सवाल करती और फिर अपनी समझ बनाती है. उसके दोस्तों को कभी-कभी लगता था कि वह ज़रूरत से ज़्यादा जिज्ञासु है, लेकिन रिद्धिमा को यही जिज्ञासा दुनिया से जोड़े रखती थी.
खजुराहो भी उसके लिए ऐसा ही एक नाम था, जिसके बारे में उसने बहुत कुछ सुना था. किसी ने वहाँ की मूर्तियों की चर्चा की, किसी ने मंदिरों की भव्यता की, तो किसी ने रहस्यमयी शिल्पकला की. लेकिन जितनी बातें उसने सुनीं, उतने ही सवाल उसके मन में पैदा होते गए.
एक शाम वह और राघव फोन पर बात कर रहे थे.. बातचीत का सिलसिला यूँ ही चल रहा था कि रिद्धिमा ने पूछा,आपको सबसे ज़्यादा क्या पसंद है?
राघव ने बिना सोचे जवाब दिया, घूमना… और फोटोग्राफी. नई जगहों को कैमरे में कैद करना मुझे अच्छा लगता है.
और आपको? उसने मुस्कुराकर पूछा.
डांस, रिद्धिमा ने कहा, जहाँ संगीत और संस्कृति हो, वहाँ मेरा मन अपने आप खिंच जाता है.
राघव कुछ क्षण सोचता रहा, फिर बोला-
तो फिर हमें खजुराहो जाना चाहिए.
खजुराहो? रिद्धिमा की आँखों में चमक आ गई.
हाँ. वहाँ हर साल खजुराहो डांस फेस्टिवल होता है. तुम्हें नृत्य मिलेगा और मुझे फोटोग्राफी.यह विचार दोनों को इतना पसंद आया कि उसी समय यात्रा की योजना बनने लगी. घर पहुँचते ही रिद्धिमा ने लैपटॉप खोल लिया. उसने पुणे से खजुराहो तक पहुँचने के सभी विकल्प देखने शुरू किए. कौन-सी फ्लाइट बेहतर रहेगी, होटल कहाँ लेना चाहिए, कौन-कौन से मंदिर देखने हैं, डांस फेस्टिवल की तारीखें क्या हैंवह हर छोटी-बड़ी जानकारी जुटाने लगी.
राघव ने फोन पर हँसते हुए कहा-तुम तो लग रहा है पूरा रिसर्च पेपर तैयार कर दोगी.जगह को समझे बिना वहाँ जाना अधूरी यात्रा होती है, रिद्धिमा ने जवाब दिया.
कुछ ही दिनों बाद दोनों खजुराहो पहुँच गए.
अगली सुबह सूरज की पहली किरणों के साथ वे पश्चिमी मंदिर समूह की ओर निकल पड़े. सामने कंदारिया महादेव मंदिर अपनी पूरी भव्यता के साथ खड़ा था. उसके ऊँचे शिखर सुबह की सुनहरी रोशनी में चमक रहे थे.
राघव का कैमरा लगातार काम कर रहा था. कभी वह किसी मूर्ति का क्लोज़-अप लेता, कभी पूरे मंदिर को फ्रेम में कैद करता. उसे लगता था जैसे पत्थर नहीं, कोई जीवंत कहानी उसके सामने खड़ी हो.उधर रिद्धिमा मंदिर की दीवारों पर उकेरे गए दृश्य ध्यान से देख रही थी. उसने देखा कि वहाँ सिर्फ वही मूर्तियाँ नहीं थीं जिनकी चर्चा लोग करते हैं. वहाँ नर्तकियाँ थीं, संगीतकार थे, योद्धा थे, साधक थे, किसान थे, पशु-पक्षी थे और जीवन के अनगिनत दृश्य थे.
वह कुछ देर चुप रही, फिर बोली,
अजीब है… लोग तो खजुराहो की पहचान कुछ मूर्तियों तक सीमित कर देते हैं, जबकि यहाँ तो पूरा जीवन पत्थरों पर उकेरा गया है.
राघव ने कैमरा नीचे करते हुए कहा-शायद लोग वही देखते हैं जो उन्हें सबसे अलग दिखाई देता है. उनकी मुलाकात एक स्थानीय गाइड से हुई. उसने उन्हें बताया कि जिन मूर्तियों को लेकर सबसे अधिक चर्चा होती है, वे पूरे शिल्प का बहुत छोटा हिस्सा हैं. अधिकांश मूर्तियाँ उस समय के समाज, संस्कृति और जीवन को दर्शाती हैं.गाइड की बातें सुनते-सुनते रिद्धिमा को महसूस हुआ कि खजुराहो को समझने के लिए सिर्फ आँखें नहीं, दृष्टि चाहिए.
जब वे मंदिर के गर्भगृह में पहुँचे तो बाहर की चहल-पहल जैसे पीछे छूट गई. वहाँ एक अलग ही शांति थी.
रिद्धिमा ने कहा-शायद यही कारण है कि बाहर संसार और भीतर ईश्वर को दर्शाया गया है.
राघव ने उसकी ओर देखा
क्या समझीं?
यही कि जीवन को नकार कर नहीं, समझकर आगे बढ़ना पड़ता है.
शाम को दोनों खजुराहो डांस फेस्टिवल देखने पहुँचे.
मंदिरों की पृष्ठभूमि में जब कथक के घुँघरू बजे और फिर ओडिसी की मुद्राएँ मंच पर उभरीं, तो वातावरण जैसे किसी और ही दुनिया में बदल गया. रोशनी से जगमगाते मंदिर, शास्त्रीय संगीत और कलाकारों की भावपूर्ण प्रस्तुतियाँसब कुछ अद्भुत था.रिद्धिमा मंत्रमुग्ध होकर मंच को देख रही थी. उसे लग रहा था जैसे सदियों पुरानी कला आज भी उसी जीवंतता से साँस ले रही है.
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद उसने कहा-अब समझ में आया कि खजुराहो सिर्फ देखने की जगह नहीं है, इसे महसूस करना पड़ता है.अगले दो दिनों में उन्होंने पूर्वी और दक्षिणी मंदिर समूह भी देखे. रनेह फॉल्स गए, जहाँ रंग-बिरंगी चट्टानों के बीच बहता पानी किसी चित्र जैसा दिखाई देता था. पन्ना टाइगर रिज़र्व की यात्रा भी की, जहाँ जंगल की नीरवता ने उन्हें शहर के शोर से बिल्कुल अलग दुनिया में पहुँचा दिया.लेकिन पूरी यात्रा में सबसे अधिक प्रभाव उन मंदिरों ने छोड़ा, जो एक हजार साल बाद भी अपनी कला और संदेश के साथ खड़े थे.
वापसी की उड़ान में राघव अपनी तस्वीरें देख रहा था और रिद्धिमा खिड़की से बादलों को
कुछ देर बाद राघव ने पूछा-तो तुम्हारी सारी जिज्ञासाओं का जवाब मिल गया?
रिद्धिमा मुस्कुराई.

जवाब भी मिले और कुछ नए सवाल भी. लेकिन अब मैं खजुराहो को सिर्फ उन मूर्तियों से नहीं पहचानूँगी, जिनकी चर्चा लोग करते हैं.
फिर किससे?
उस सोच से, जिसने जीवन को उसकी संपूर्णता में देखने की हिम्मत की थी.
राघव ने कैमरा बंद कर दिया.
वह जानता था कि इस यात्रा से उसे शानदार तस्वीरें मिली हैं, लेकिन रिद्धिमा को उससे कहीं अधिक मिला था.एक नई समझ.और शायद यही किसी भी यात्रा की सबसे बड़ी सफलता होती है. जब हम किसी जगह को देखने नहीं, उसे समझने लगते हैं. खजुराहो ने दोनों को यही सिखाया था.

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