
सुरेश परिहार, पुणे
शाम ढल रही थी. रिद्धिमा अपने घर के बरामदे में अपनी पसदीदा जगह झूले पर बैठी थी, बाहर से आते जाते लोगों को देख रही थी… बरामदे में एक धूप का कतरा बरामदे के फर्श पर फैल रहा था. रिद्धिमा झूले में ही मोबाइल रखा था, लेकिन वह उसे बार-बार उठाकर फिर रख दे रही थी.
उसकी उंगलियाँ जैसे किसी संदेश का इंतज़ार कर रही थीं.
कभी ऐसा नहीं था.
एक समय था जब उसने अपने चारों ओर भावनाओं की ऊँची दीवारें खड़ी कर ली थीं. जीवन ने उसे इतना कुछ सिखाया था कि अब किसी को अपने मन के करीब आने देने का साहस उसमें नहीं बचा था. उसने तय कर लिया था कि वह किसी से इतना नहीं जुड़ेगी कि उसके होने या न होने से उसकी दुनिया प्रभावित हो.
फिर राघव आया.
शुरुआत में वह उसे बिल्कुल पसंद नहीं था. कम से कम वह खुद से यही कहती थी. उसके संदेशों का देर से जवाब देना, बातचीत को छोटा रखना, हर बार एक दूरी बनाए रखना. रिद्धिमा ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
लेकिन राघव अजीब था….
वह बिना किसी शिकायत के उसकी चुप्पियों को भी सुन लेता था. उसके छोटे-छोटे उत्तरों में छिपी थकान को समझ लेता था. जब वह हँसती, तो उसकी खुशी महसूस करता और जब वह उदास होती, तो बिना पूछे भी उसके आसपास एक अदृश्य सहारा बनकर खड़ा हो जाता.
धीरे-धीरे रिद्धिमा को एहसास हुआ कि वह दिन में कई बार राघव के बारे में सोचने लगी है.
सुबह की चाय के साथ…. किचन में खाना बनाते हुए…दोपहर की व्यस्तता के बीच….और रात को सोने से पहले.
यह प्रेम जैसा नहीं था….या शायद वही था, जिसे वह प्रेम मानने से डरती थी.
एक दिन पूरे चौबीस घंटे राघव का कोई संदेश नहीं आया….
रिद्धिमा ने खुद को समझाया कि वह व्यस्त होगा. फिर भी न जाने क्यों पूरा दिन खाली-खाली सा लगा. जैसे किसी किताब का एक महत्वपूर्ण पन्ना गायब हो गया हो….. उस रात जब मोबाइल की स्क्रीन पर राघव का मैसेज आया…
आज बहुत काम था, देर हो गई…तो अनायास ही उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई.उसी क्षण उसने महसूस किया कि कुछ बदल चुका है.
बहुत गहराई में….बहुत चुपचाप…और शायद हमेशा के लिए…रिद्धिमा को राघव की सबसे खूबसूरत बात यह लगती थी कि वह उसे बदलना नहीं चाहता था. वह उसे उसी रूप में स्वीकार करता था जैसी वह थीउसकी ताकतों सहित, उसकी कमजोरियों सहित….दुनिया के सामने मजबूत बने रहना आसान नहीं होता….हर दर्द को मुस्कान में छिपा लेना, हर टूटन को सामान्य दिखाना, हर संघर्ष को अकेले सहना… यह सब थका देता है.
लेकिन राघव के सामने उसे कभी मजबूत बनने का अभिनय नहीं करना पड़ता था….वह वहाँ स्वयं हो सकती थी.
बिल्कुल वैसी, जैसी वह भीतर से थी….एक शाम रिद्धिमा बरामदे में खड़ी हुई थी.. उसने राघव को फोटो भेजा… मैसेज था हमारे यहां बारिश होने वाली है… फिर अचानक बारिश भी शुरु होने लगी… रिद्धिमा ने फिर मैसेज किया मेरा आज बारिश में भीगने का मन हो रहा है… वह बाहर से पानी में भीग रही थी.. लेकिन उसे अंदर से महसूस हो रहा था कि वह राघव के प्यार में भी सराबोर हो रही थी.. उसने मैसेज में राघव को बारिश में भीगने का वीडियो भी सेंड किया..
तभी राघव का मैसेज आया…जानती हो रिद्धिमा कुछ लोग जीवन में प्रेम बनकर नहीं आते, सुकून बनकर आते हैं…रिद्धिमा देर तक उस एक पंक्ति को पढ़ती रही.फिर उसकी आँखें अनायास नम हो गईं.क्योंकि वह जानती थी कि राघव उसके जीवन में क्या बन चुका है.वह कोई नाम नहीं था.
कोई रिश्ता नहीं था…कोई दावा नहीं था….वह एक एहसास था.
एक ऐसा एहसास जो उसके मन के सबसे शांत कोने में आकर बैठ गया था.
जिसकी चिंता उसे अपनेपन से भर देती थी.जिसकी खुशी उसके चेहरे पर मुस्कान ले आती थी.जिसकी मौजूदगी जीवन के शोर में सुकून जैसी लगती थी.
उस रात उसने अपनी मोबाइल के नोटपेड में लिखा कुछ लोग हमारी जिंदगी में इसलिए नहीं आते कि वे हमारी दुनिया बदल दें.वे इसलिए आते हैं कि जब हम स्वयं पर विश्वास खोने लगें, तब हमें फिर से प्रेम, विश्वास और अपने होने की सुंदरता पर यकीन दिला सकें.
राघव, तुम मेरे लिए शायद वही हो… बाहर बारिश अब भी हो रही थी….लेकिन रिद्धिमा के भीतर वर्षों बाद एक शांत उजाला उतर आया था.

मीठी कहानी❤️ जीवन में प्रेम या प्रेम जैसा कोई रिश्ता होना बहुत जरूरी है। अच्छा लिखा आपने
Absolutely true. Very real … Bahut achha likha hai aapne..
बढ़िया लगी सर
एहसास को पढ़ना एहसासों से भरा हुआ था। बहुत प्यारी कहानी।
‘अहसास ‘ का अहसास सूरज की पहली किरण जैसा,बारिश की पहली बूंद की सोंधी खुशबू जैसा जहन उतरता चला गया।
सुंदर अभिव्यक्ति प्रेम की
Bahut sundar abhivayakti hai ankahe prem ki sir
शाश्वत प्रेम की भावप्रवण , हृदयस्पर्शी कहानी आपकी आदरणीय श्री सुरेश परिहार जी 👌🥰🙏🌷