ख़्वाब बुनती रात

ख़्वाब बुनती रात कविता रात और सपनों की भावनात्मक हिंदी रचना

माधुरी द्विवेदी, कानपुर

कुछ स्याह, कुछ सफेद ख़्वाब बुनती हुई ये रात,
धीरे-धीरे जब पलकों पर उतरती है…

तब मन में शब्द कोलाहल करते हैं,
कोई कल्पना आकार लेती है,
उँगलियाँ कलम तलाश करती हैं।

क्यों…???
क्या कोई शख़्स पन्नों पर उतरने को बेकरार है?
या कोई बसने लगा है
ज़ेहन-ओ-दिल में…??

कौन है… क्या है…?
…नहीं जानती…

मेरे अंदर प्रेम जनमता है
या विरह पनपता है…??

कभी-कभी लगता है जैसे
किसी अनदेखे स्वप्न को जी रही हूँ…

या बस एक ख़याल भर है…!!

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