A lone figure standing at the edge of a quiet riverbank during early dawn, soft golden-blue light reflecting on the water. The person looks contemplative, gazing at gentle ripples as if questioning life’s truths. Surrounding nature appears symbolic—distant mountains, drifting

जीवन-मंथन

जीवन की हर बढ़ती घड़ी में मन बार-बार सवाल करता है सुख और दुख के इस लंबे सफ़र में हमने कितना देखा, क्या खोया और क्या पाया। माया अपनी चकाचौंध से हमें छलती रहती है, सत्ता और वैभव के प्रलोभन दिखाती है, और इन्हें पाने की चाह में हम अनगिनत अंधेरों से गुजरते हैं।

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ख़त अपने नाम…

आज का खयाल सीधा दिल को छू गया—क्यों न खुद से ही अपनी कीमत पूछी जाए, बजाय दूसरों की नज़रों में ढूँढ़ने के। क्यों न एक ख़त खुद को लिखा जाए, जिसमें अपने ही बचपन की हँसी, अपनी ही रंगीन तितली-सी चंचलता, और अपनी ही खुशबू को फिर से महसूस किया जाए। जीवन की भाग-दौड़ में खोकर हम खुद को सँवारना भूल जाते हैं, लेकिन जब खुद से मुलाक़ात होती है, तो एहसास होता है कि सबसे बड़ा ख़िताब, सबसे सुंदर परिभाषा, हमेशा से हमारे अपने ही नाम थी।

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साँझ..

उम्र की इस साँझ में, जब तुम स्वयं से मिले — यह कविता जीवन की उस अवस्था की बात करती है जहाँ इंसान अपने अनुभवों और अधूरी इच्छाओं की परछाइयों से रूबरू होता है। मन की चुप्पी में जब आत्मा खुद से सवाल करती है — ‘क्यों इतने भ्रम में ढले?’ — तो यह जीवन की उन अधूरी आकांक्षाओं और खोई हुई संभावनाओं की ओर इशारा करता है जो समय के साथ रह गईं।

कविता का केन्द्रीय भाव यह है कि जो हम जीवन भर बाहर खोजते हैं — जैसे संतोष, प्रेम, आत्मिक शांति — वो हमारे ही भीतर है, ठीक उसी तरह जैसे मृग के भीतर ही कस्तूरी होती है। लेकिन मन फिर भी किसी सहारे, किसी उम्मीद की डोर से बंधा रहता है।

‘हर किसी की राह में एक अधूरा काश है’ — यह पंक्ति जीवन की सार्वभौमिक सच्चाई को व्यक्त करती है कि हर इंसान के मन में कुछ अधूरी इच्छाएँ रह जाती हैं। और शायद वही अधूरापन हमें इंसान बनाता है, हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

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