हां! मैं मधुशाला जाता हूं…

हाँ, मैं मधुशाला जाता हूँ। अपनी सुध-बुध मिटाने, मृगतृष्णा जैसे सपनों को थोड़ी देर छू लेने, थोड़ा बुदबुदा कर मन की गाँठें ढीली करने और अपने ही दिल को समझाने के लिए। कड़वी बातें जब अंदर लंबी चुभन बनकर रह जाती हैं और हँसी की गुंजन भी फीकी पड़ जाती है.तब बस थोड़ी नई ऊर्जा जुटाने को मैं वहाँ जाता हूँ। मैं नादान भी नहीं हूँ और न पागल, न ही कोई भटका हुआ आदमी। दूसरों की सभी बातें सुनकर भी अपने असली ज़ख्म तो दिल में ही रखता हूँ और इन्हीं घावों की आवाज़ सुनने के लिए भी मैं मधुशाला जाता हूँ।

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