जरा-ज़रा तू हमसे मिल

मन बार-बार उस प्रिय को पुकारता है—“जरा-सा मिलो, तनिक-सा मेरे दिल में उतर आओ।” आँखें जो कहती हैं, वही शब्दों से सुनना चाहता है। सपनों में बीती रातें और अंतस की अनकही बातें, सब उसी से जुड़ी हैं। उसका साथ वेदना हर लेता है, उसके अधरों की मुस्कान अमृत बरसाती है। यदि मिल न पाए तो हृदय तड़प-तड़प कर व्याकुल हो उठता है। अब तो चाह यही है कि वह बिना दस्तक इस जीवन में आ बसे, और परिणय के बंधन में सब कुछ स्थिर हो जाए। उसकी आँखों की गहराई में डूब जाना मानो किसी झील में समा जाना है।

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चूड़ियाँ

चूड़ियाँ सिर्फ़ काँच की बनी वस्तुएँ नहीं होतीं। वे माँ के हाथ उठते ही दुआओं का आशीर्वाद बन जाती हैं, बहन के राखी बाँधते ही रिश्तों की मजबूती का प्रतीक बन जाती हैं, और प्रियतम के सानिध्य में खुशियों की खनक। देखने में नाज़ुक और रंग-बिरंगी होने के बावजूद, वे जीवन की डोर को बाँधने और संबंधों को सहेजने का अद्भुत सामर्थ्य रखती हैं। चूड़ियाँ कमज़ोर नहीं होतीं—वे औरत की शक्ति, उसकी संवेदनाओं और उसके अटूट वसूलों का प्रतीक हैं।

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