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रेगिस्तान में खड़ी एक पारंपरिक वेशभूषा में महिला, गर्म रेत और धूप के बीच संघर्ष और दृढ़ता का प्रतीक

मरु-स्त्री: मरुस्थल की स्त्री पर मार्मिक हिंदी कविता

मरु-स्त्री” एक ऐसी कविता है जो रेगिस्तान की कठोरता के बीच जीती स्त्री के भीतर छिपी अनकही विरासत और पीड़ा को उजागर करती है। यहाँ प्यास केवल एक शारीरिक अवस्था नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक मौन धरोहर है। यह स्त्री रेत की तरह बिखरती नहीं, बल्कि फैलकर अपने अस्तित्व को जीवित रखती है। उसकी हर चाल, हर चुप्पी और हर प्रतीक्षा में संघर्ष, सहनशीलता और जीवन की अदम्य शक्ति झलकती है जो मरुस्थल की सूनी धरती में भी हरियाली की तरह आशा जगाती है

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