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अकेला व्यक्ति अपनी भावनाओं और दर्द के साथ मौन बैठा हुआ, सुनने वाले की तलाश में

‘विलुप्त श्रोता’

‘विलुप्त श्रोता’ एक मार्मिक मुक्तछंद कविता है, जो मनुष्य के भीतर जमा होते दर्द, भावनात्मक थकान और ऐसे समय की विडंबना को उजागर करती है जहाँ सुनने वाले लोग धीरे-धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं।

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