इश्क नहीं… मगर कम भी नहीं
रिद्धिमा और राघव की यह कहानी प्रेम, अपनापन और भावनात्मक सीमाओं के बीच खड़े एक ऐसे रिश्ते की दास्तान है, जहाँ स्नेह है, पर अधिकार नहीं।

रिद्धिमा और राघव की यह कहानी प्रेम, अपनापन और भावनात्मक सीमाओं के बीच खड़े एक ऐसे रिश्ते की दास्तान है, जहाँ स्नेह है, पर अधिकार नहीं।
“वह छोटी सी बच्ची बिना कुछ कहे मुझे व्यवस्थित रहना सिखा रही थी।कभी माँ जैसी समझाती, कभी दोस्त सी हँसी बिखेरती, और कभी बेटी सी बाँहों में समा जाती। शायद नन्ही मेरे जीवन में भगवान की भेजी हुई वो रोशनी थी,जिसने मेरी तन्हाई को घर बना दिया।”