अरमान
नदी के किनारे खड़े होकर वह लंबे समय तक मटमैले पानी को निहारता रहा। हफ्तों से पानी देखने की आस थी, पर आज जब पानी सामने था तो वह विनाश का दूत बन आया था। अरमान तो बहुत थे—खेत लहलहाने के, फसल कटने की, जीवन संवरने की—पर अब सब कुछ बह चुका था। उसने भारी मन से कहा, “बहुत अरमान थे तुझे… देख ले पानी… जी भर के…”
