अधूरी चाय, अधूरा इश्क़
चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।

चाय को ना नहीं बोलते साहब, पाप लगता है…” — और इस मासूम से वाक्य ने मोहित की ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। वर्षों बाद जब वही चाय की खुशबू और वही बात एक नन्हीं बच्ची ने दोहराई, तो अधूरी कहानी को एक नया अंत मिल गया।
अनुपम नीता बरडे, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) मैं उस शख़्स को शाष्टांग दण्डवत करता हूँ जिसने पहले पहल “आँख मारने ” की कला विकसित की ! ज़रा आप ही सोच कर देखिये कि इस छोटे से , सरल से “संकेत” से कितना बड़ा “संदेश” , पलक झपकते ही दूसरी ओर चला जाता है और मैं…