खयालों की दहलीज पर…

बड़े अदब के साथ अल्फाज़ खड़े हैं, खयालों की दहलीज पर। मौन से हारे हुए हुड़दंग भीतर ही भीतर मच रहे हैं। जज़्बातों से सराबोर, अल्फाज़ मचल तो रहे हैं, पर तमीज़ ने उन्हें रोक रखा है, इस तरह कि वे सरेआम बाहर नहीं आ पा रहे।इसलिए बेचारे अल्फाज़ सहम गए हैं, किसी नकाबपोश औरत की तरह। अब उन्होंने अपने अभिव्यक्ति का एक जरिया ढूंढ लिया है। इसी वजह से आजकल उनकी आंखें भी बोलने लगी हैं—वो भी, अल्फाज़ों के परे।

Read More

जीना इसी का नाम है..

क्या जीवन में सहज हो जाना वास्तव में इतना आसान होता है? क्या गिरकर, रोकर चुप हो जाना सरल होता है? कुछ पाकर उसे खो देना, कठिन समय में भी मजबूत बने रहना — यह सब आसान नहीं होता। खासकर एक स्त्री के लिए, जो सही होते हुए भी चुपचाप गलत सुनी जाती है, मूक रह जाती है। फिर भी, स्त्रियाँ यह सब सहती हैं, चोट खाकर भी मुस्कुराना सीख जाती हैं। उनके लिए जीना बस यूँ ही गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते रहना है, क्योंकि असल में — जीना इसी का नाम है।

Read More