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घर वापसी

घर लौटने का सुख वही जानता है जिसने अनजान राहों पर किस्मत के सहारे सफर किया हो, स्टेशन की पानीदार चाय से भूख बुझाई हो, और आखिर में अपने लोगों से फिर मिलने की गर्माहट महसूस की हो, क्योंकि घर वापसी सिर्फ लौटना नहीं, अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ जाना है।

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त्योहार पर घर

घर जाने का नाम आते ही उसके भीतर एक अजीब-सा डर जाग उठता है। डर किसी अनजान रास्ते का नहीं, बल्कि एक बहुत परिचित सवाल का है—
“क्या करते हो आजकल?”यही सवाल उसकी हिम्मत तोड़ देता है। यही वजह है कि वह एक और त्योहार भी अपने छोटे से कमरे में बिताने को मजबूर हो जाता है।उसके चारों ओर बिखरी रहती हैं कुछ पुरानी किताबें, कुछ बर्तन, मेज़ पर रखा टेबल लैंप और कोनों में धुंधले पड़ते सपनों की परछाइयाँ। इन्हीं सबके बीच वह सोचता है कि क्या उसे एक और साल की मोहलत खुद को देनी चाहिए या फिर चुपचाप उन सपनों को यहीं छोड़ देना चाहिए।

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