मन बंजारा

मन जैसे किसी अनजानी खोज में निकल पड़ा है। अब उसे ठहराव अच्छा नहीं लगता. तपती रेत भी उसे सुकून देती है. गर्म हवाओं के थपेड़े तन को झुलसा देते हैं, पर मन फिर भी मुस्कुरा उठता है। कभी कहीं से आती करुण पुकार उसे रुला देती है, तो कभी बिना कारण हँसी में डूब जाता है। माथे की बिंदिया, हाथों की चुड़ियाँ, झूलती बालियाँ .सब जैसे जीवन की थकान को सहला जाती हैं. रंग-बिरंगे घाघरों के बीच मटमैले सपने पलते हैं, और जब रात उतरती है, तो चाँदनी सबको अपनी गोद में सुला देती है.

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मंजिल

अकेलेपन और मार्गदर्शन की खोज का भावपूर्ण वर्णन है। लेखक अपने जीवन में उस पल का अनुभव कर रहा है जब न खुद की दिशा स्पष्ट है, न किसी और का ठिकाना। वह मंजिल और साथी की तलाश में अकेले खड़ा है, उम्मीद करता है कि कोई आए और उसे नए मार्ग की ओर ले जाए। यह एक आत्मान्वेषण और साथी की आवश्यकता की कविता है, जो जीवन में खोए हुए मार्ग और मिलने वाली नई मंजिल की प्रतीक्षा को उजागर करती है।

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