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आजादी का कृष्णपक्ष

आजादी का कृष्णपक्ष**” में कवि स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव की उमंग और उल्लास का चित्रण करते हुए हमें याद दिलाता है कि यह आजादी सहज या मुफ्त में नहीं मिली थी। नीति-कुशलता और योजनाओं के बल पर विदेशी शक्तियों ने भारत में अपने पैर जमाए और “सोने की चिड़िया” के घर में लूटपाट मचाई। फूट डालकर शासन करने की नीति ने धर्मों पर संकट और आपसी विभाजन की आग फैलाई।आजादी के स्वप्न देखने वाले वीरों ने प्राणों की आहुति दी, परंतु उन्हें यह आभास भी नहीं था कि स्वतंत्रता के साथ ही देश को बंटवारे का फरमान मिलेगा। इस उपलब्धि में असंख्य जवानियों की कुर्बानी और बंटवारे में छुपी अनेक अनसुनी कहानियाँ शामिल हैं, जिनमें दुख, करुणा, आतंक और दर्द की गहरी परतें छिपी हैं। विभाजन और विस्थापन के दौरान साथ निभाने वालों ने ही घर-द्वार लूट लिए, मानवता पर पशुता हावी हो गई, हिंसा ने अहिंसा को ढक लिया। कवि आने वाली पीढ़ियों को यह सच्चाई बताने का आग्रह करता है कि भारत नफरत और हिंसा की आड़ में खंडित हुआ।

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