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त्रकारिता में आत्मसम्मान, कार्यस्थल की राजनीति और पेशेवर चुनौतियों को दर्शाता दृश्य।

मुन्ना से कीर्ति राणा-6

एक तरफ उज्जैन में ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी, दूसरी तरफ पांचवें रिपोर्टर के रूप में काम करने की चेतावनी। कीर्ति राणा के इस संस्मरण में पत्रकारिता की अंदरूनी राजनीति, बदलते व्यवहार और ग्वालियर तबादले की पेशकश के बीच लिए गए एक अहम फैसले की कहानी है।

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पुरानी रेल यात्रा में भारतीय परिवार घर से लाई आलू-पूरी खाते हुए

याद न जाए बीते दिनों की!

कभी रेल यात्रा का मतलब था घर से बँधी आलू-पूरी, अख़बार में परोसी चाट, खिड़की से मिलती चाय और अनजान सहयात्रियों से बनती दोस्ती। आज सुविधाएँ बढ़ गई हैं, लेकिन क्या सफ़र का वह अपनापन कहीं पीछे छूट गया है? बीते दिनों की यादों में डूबा एक आत्मीय संस्मरण।

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बाई की पुरानी पेटी और बाबूजी की पेटी में सहेजी बचपन की यादें

दो पेटियाँ, आधी सदी की यादें

दिवाली की सफाई में खुलती बाई की पेटी और बाबूजी की पेटी केवल पुराना सामान नहीं, बल्कि बचपन, माता-पिता के स्नेह और आधी सदी पुरानी यादों का खजाना हैं। इन पेटियों से जुड़ा यह संस्मरण बीते समय और परिवार की अनमोल स्मृतियों को फिर से जीवंत करता है।

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गरीब मोची बच्चे को रिक्शे के लिए पैसे देते हुए

बड़े दिलवाला

कभी-कभी छोटी-सी मदद इंसान के दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। यह कहानी एक गरीब मोची के बड़े दिल और उसकी सच्ची इंसानियत की मार्मिक याद है।

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पापा की खाली लकड़ी की कुर्सी, जिस पर उनकी यादें आज भी जीवित हैं – भावुक हिंदी संस्मरण

कुर्सी

घर के एक कोने में रखी वह पुरानी कुर्सी आज भी केवल लकड़ी का एक फर्नीचर नहीं लगती। वह पिता की आदतों, उनके अनुशासन, उनके स्नेह और पूरे परिवार की अनगिनत यादों की साक्षी है। इस मार्मिक संस्मरण में एक बेटी अपनी स्मृतियों के सहारे उस खाली कुर्सी में आज भी अपने पापा की मुस्कुराती हुई छवि देखती है। यह कहानी हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाएगी, जिसने अपने पिता को खोया है या उनकी यादों को संजोए रखा है।

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नीली जुबान और जामुन

नीली जुबान….!

जामुन की नीली जुबान, बचपन की मासूम खुशियां, आईने के सामने की शरारतें और सेहत से जुड़ी अनमोल बातें यह लेख जामुन के स्वाद, यादों और उसके औषधीय गुणों को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है।

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गली में हाथ-ठेला लगाए कलई वाला, भट्टी के पास रखे पीतल के बर्तन और आसपास खड़े उत्सुक बच्चे

इतनी-सी खुशी!

“कलई करा लो…” की पुकार के साथ शुरू होती थी बचपन की हलचल। पीतल के बर्तनों की चमक, भट्टी की आँच और राँगे की खुशबू के बीच छिपी थीं मासूम खुशियाँ। यह संस्मरण केवल कलई की प्रक्रिया का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, पारिवारिक आत्मीयता और छोटी-छोटी बातों में मिलने वाली अपार खुशी की झलक है। आज की चकाचौंध भरी दुनिया में वे दिन याद बनकर मन को भिगो जाते हैं।

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माँ की याद में लिखी गई भावनात्मक चिट्ठी दर्शाती प्रतीकात्मक तस्वीर

मां के नाम आसुंओं से भीगी चिट्ठी

“एक पाती माँ के नाम” एक बेटी का अपनी माँ को लिखा गया हृदयविदारक पत्र है, जिसमें बिछोह, स्मृतियाँ, तन्हाई और माँ की अमिट उपस्थिति शब्दों में ढलती है। यह रचना हर उस पाठक को छूती है जिसने कभी माँ को खोया है।

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गोवा के समुद्र तट पर परिवार के साथ बिताए भावनात्मक पल

वाह… गोवा… वाह !

गोवा की यह यात्रा शोर-शराबे से ज़्यादा स्मृतियों की शांति है। समुद्र की लहरें, माँ की यादें, पोते की ज़िद और परिवार के साथ बिताए पल—यह संस्मरण गोवा को महसूस करने की एक भावनात्मक कोशिश है।

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बेटे का इंतजार करती मां की भावुक और प्यार भरी यादें –

बाई, आज तू होती तो…

बाई की वह मुद्रा कभी अचानक नहीं होती थी. पूरा महीना इंतज़ार करने के बाद, जब मैं पुणे से अपने घर लौटता, तो माँ हमारे पहले मकान के पहले कमरे में खिड़की खोलकर बैठी होती थी. कहने को तो वह दूध लेने वाले का इंतज़ार कर रही होती थी, पर असल में उसे मेरा ही इंतज़ार होता था. जैसे ही मैं दरवाज़े से भीतर कदम रखता, वह हल्की-सी मुस्कान के साथ एक ही नज़र में मेरा पूरा एक्स-रे कर लेती.. दुबला तो नहीं हुआ, काला तो नहीं हो गयाए बाल और स़फेद हुए या डाई नहीं की. कुछ भी उससे छुपा नहीं रहता था.

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