बड़े दिलवाला
कभी-कभी छोटी-सी मदद इंसान के दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। यह कहानी एक गरीब मोची के बड़े दिल और उसकी सच्ची इंसानियत की मार्मिक याद है।

कभी-कभी छोटी-सी मदद इंसान के दिल में ऐसी जगह बना लेती है, जिसे वर्षों बाद भी भुलाया नहीं जा सकता। यह कहानी एक गरीब मोची के बड़े दिल और उसकी सच्ची इंसानियत की मार्मिक याद है।
घर के एक कोने में रखी वह पुरानी कुर्सी आज भी केवल लकड़ी का एक फर्नीचर नहीं लगती। वह पिता की आदतों, उनके अनुशासन, उनके स्नेह और पूरे परिवार की अनगिनत यादों की साक्षी है। इस मार्मिक संस्मरण में एक बेटी अपनी स्मृतियों के सहारे उस खाली कुर्सी में आज भी अपने पापा की मुस्कुराती हुई छवि देखती है। यह कहानी हर उस व्यक्ति के दिल को छू जाएगी, जिसने अपने पिता को खोया है या उनकी यादों को संजोए रखा है।
जामुन की नीली जुबान, बचपन की मासूम खुशियां, आईने के सामने की शरारतें और सेहत से जुड़ी अनमोल बातें यह लेख जामुन के स्वाद, यादों और उसके औषधीय गुणों को बेहद रोचक अंदाज में प्रस्तुत करता है।
“कलई करा लो…” की पुकार के साथ शुरू होती थी बचपन की हलचल। पीतल के बर्तनों की चमक, भट्टी की आँच और राँगे की खुशबू के बीच छिपी थीं मासूम खुशियाँ। यह संस्मरण केवल कलई की प्रक्रिया का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, पारिवारिक आत्मीयता और छोटी-छोटी बातों में मिलने वाली अपार खुशी की झलक है। आज की चकाचौंध भरी दुनिया में वे दिन याद बनकर मन को भिगो जाते हैं।
“एक पाती माँ के नाम” एक बेटी का अपनी माँ को लिखा गया हृदयविदारक पत्र है, जिसमें बिछोह, स्मृतियाँ, तन्हाई और माँ की अमिट उपस्थिति शब्दों में ढलती है। यह रचना हर उस पाठक को छूती है जिसने कभी माँ को खोया है।
गोवा की यह यात्रा शोर-शराबे से ज़्यादा स्मृतियों की शांति है। समुद्र की लहरें, माँ की यादें, पोते की ज़िद और परिवार के साथ बिताए पल—यह संस्मरण गोवा को महसूस करने की एक भावनात्मक कोशिश है।
बाई की वह मुद्रा कभी अचानक नहीं होती थी. पूरा महीना इंतज़ार करने के बाद, जब मैं पुणे से अपने घर लौटता, तो माँ हमारे पहले मकान के पहले कमरे में खिड़की खोलकर बैठी होती थी. कहने को तो वह दूध लेने वाले का इंतज़ार कर रही होती थी, पर असल में उसे मेरा ही इंतज़ार होता था. जैसे ही मैं दरवाज़े से भीतर कदम रखता, वह हल्की-सी मुस्कान के साथ एक ही नज़र में मेरा पूरा एक्स-रे कर लेती.. दुबला तो नहीं हुआ, काला तो नहीं हो गयाए बाल और स़फेद हुए या डाई नहीं की. कुछ भी उससे छुपा नहीं रहता था.
कटहल सिर्फ सब्ज़ी नहीं, बचपन की मिठास है — नानाजी के घर पके कटहल का स्वाद, नानी के गोवा से लाए कटहल के तीखे पापड़, भुने हुए काजू और वो हँसी के ठहाके, जब हम सोचते थे कि हम ही हैं जो पूरा कटहल खा जाते हैं। अब सिर्फ स्वाद की यादें हैं — और हर मौसम में एक उम्मीद कि कहीं से फिर आ जाए वो पुराना कटहल…”
अनुपम नीता बरडे, प्रसिद्ध व्यंग्यकार, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) मैं उस शख़्स को शाष्टांग दण्डवत करता हूँ जिसने पहले पहल “आँख मारने ” की कला विकसित की ! ज़रा आप ही सोच कर देखिये कि इस छोटे से , सरल से “संकेत” से कितना बड़ा “संदेश” , पलक झपकते ही दूसरी ओर चला जाता है और मैं…