दिल को छूती मौन की गूँज…
“निशिगंधा की महक से जग उठा संसार, आंखों में बह रही गंगा और यमुना की धाराएँ। मिट्टी के दीपों की रौशनी में प्रार्थना और शांति पंचतत्व में विलीन हो रही हैं, और एक गीत हर दिल को छूते हुए गूँज रहा है।”
“निशिगंधा की महक से जग उठा संसार, आंखों में बह रही गंगा और यमुना की धाराएँ। मिट्टी के दीपों की रौशनी में प्रार्थना और शांति पंचतत्व में विलीन हो रही हैं, और एक गीत हर दिल को छूते हुए गूँज रहा है।”
सुबह का नशा धीरे-धीरे चढ़ा तो था, लेकिन शाम तक उतर गया। यह प्रेम भी कुछ वैसा ही था—जिसे टिकना चाहिए था, पर ठहर न सका। अजीब बात यह रही कि उसे भी तलाश थी और मुझे भी, लेकिन जब वह सामने खड़ा था, तब भी पता नहीं क्यों वह न जाने कहाँ गुम हो गया।
इसके बाद न कोई तलब बची, न कोई बेक़रारी। सब कुछ जैसे अचानक खत्म हो गया और मेरे भीतर की बेचैनियों को किसी ने एक ही पल में कुतर डाला। मुझे याद है, शायद वह कोई फकीर ही रहा होगा, जिसकी उपस्थिति ने मेरे मन को इस कदर सँवार दिया कि सब कुछ बदल गया।
यह कविता प्रेम, विश्वास और जीवनभर साथ निभाने के संकल्प को दर्शाती है। भारतीय सांस्कृतिक संदर्भों में रची यह रचना स्त्री के समर्पण, स्नेह और भावनात्मक सुरक्षा की आकांक्षा को कोमल शब्दों में व्यक्त करती है।
जीवन में अंधेरा, आंधियां और कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन विश्वास और साहस के साथ चलना ही जीवन का सार है। दुखों से आँखें मिलाकर आगे बढ़ते हुए, दीप जलाते और खुशियाँ मनाते हुए हम अपने जीवन के गीत गाते रहें। यही प्रयास हमें भीतर और बाहर दोनों जगह उजाला देने का सामर्थ्य देता है।
भोर की नर्म रोशनी में पेड़ों से टपकते महुआ के फूल, मानो धरती पर बिखरते मोती हों — यही है इस कविता का मूल दृश्य। “मोती जैसे महुआ” में बाल-सुलभ जिज्ञासा और प्रकृति की सादगी का संगम है। दादी की डलिया, महुआ की सोंधी ख़ुशबू और उस क्षण की नीरवता — सब मिलकर एक ऐसे ग्रामीण सौंदर्य को रचते हैं, जहाँ हर फूल जीवन की मिठास और श्रम की सुगंध से भरा है।
कॉर्टिसोल हार्मोन के बढ़ते स्तर, फॉलिकल सूजन और पोषक तत्वों की कमी से बाल झड़ने लगते हैं। सही आहार और तनाव प्रबंधन से इसे रोका जा सकता है।
“मैं तो आज भी वैसी ही हूँ, वही यादों और स्नेह में जीती हुई। बदल गए तो सिर्फ तुम—वो नज़रें, वो बातें, वो अपनापन सब पीछे छूट गया। अगर अब मैं बदल भी गई हूँ, तो सवाल मुझसे नहीं, खुद से करना।”
हिन्दी भाषण प्रतियोगिता व सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन सूरीनाम हिन्दी परिषद् का 48वाँ स्थापना दिवस एवं हिन्दी पखवाड़े का शुभारंभ पाँच सितंबर को धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर “हिन्दी भाषण प्रतियोगिता” का आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने अपनी वक्तृत्व कला से श्रोताओं को प्रभावित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री करन जागेसर…
“हर दिन एक नई शुरुआत लेकर आता है, और आज का दिन भी कुछ सवालों, कुछ संभावनाओं के साथ हमारे सामने खड़ा है। बीते कल की उलझनों और आने वाले कल की चिंता में उलझे रहना स्वाभाविक है, लेकिन यदि हम ठान लें कि ‘आज’ को ही जिएंगे, तो वही सबसे बड़ा समाधान होगा। यह कविता हमें प्रेरित करती है कि हम बीते कल की चिंताओं और भविष्य की अनिश्चितताओं को छोड़कर, आज की चुनौतियों को आज ही हल करें और जीवन में नवीनता लाएं। ‘आज ही कल के कर्म को क्रम से लिया जाए’—यह संदेश हर उस व्यक्ति के लिए है जो आत्मनिर्भरता और वर्तमान में जीने की भावना को अपनाना चाहता है।”