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राकेश से शुभांशु तक: अंतरिक्ष में भारत का स्वर्णिम सफर

भारत के अंतरिक्ष सफर की कहानी राकेश शर्मा से शुरू होकर शुभांशु शुक्ला तक गर्व और आत्मसम्मान की एक नई इबारत लिखती है। बचपन की यादों में बसे राकेश शर्मा की ऐतिहासिक उपलब्धि के बाद अब शुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष यात्रा ने देशवासियों को फिर से गौरवान्वित किया है। यह सिर्फ एक अंतरिक्ष यात्रा नहीं, बल्कि हर भारतीय के लिए गर्व, प्रेरणा और आत्मबल का प्रतीक बन गई है।

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जो खुद को नहीं जाना, उसने कुछ नहीं जाना!

विद्या का वास्तविक अर्थ केवल तकनीकी ज्ञान या भौतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। यह सबसे पहले स्वयं को जानने, समझने और जीवन के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को खोजने की प्रक्रिया है। यदि हम स्वयं को और समस्त प्राणी जगत को एक ईश्वर की रचना मानकर देखें तो जीवन की अधिकांश उलझनें स्वतः समाप्त हो जाती हैं। विद्या वही है जो हमें भीतर से शुद्ध बनाए, आत्मा को जानने का अवसर दे और बाहरी दिखावे के मोह से दूर रखे।

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सपनों की कोई सरहद नहीं…

बिहार के छोटे से शहर से निकलकर देश-विदेश में अपनी साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों से पहचान बनाने वाली रंजीता सिंह फ़लक आज महिलाओं के लिए प्रेरणा का प्रतीक बन चुकी हैं। स्वयंसिद्धा संस्था के माध्यम से वह महिलाओं को सशक्त बनाने का कार्य कर रही हैं, वहीं कविकुंभ पत्रिका और अपने चर्चित काव्य संग्रहों के जरिए साहित्य जगत में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर चुकी हैं।

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बंगलौर में मिथिला महोत्सव:

“बंगलौर की धरती पर मिथिला समाज ने पहली बार संगठित होकर अपनी सांस्कृतिक शक्ति का एहसास कराया। पान, माछ, मखान के स्वाद और धरती से जुड़ने की परंपरा ने यह साबित कर दिया कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही पहचान बचती है।”

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महानता और इंसानियत के बीच खड़ी एक चिंतनशील महिला, जो जीवन के संघर्ष और संवेदनशीलता का प्रतीक है।

वह बहक गई थी…

क्या केवल अच्छा इंसान होना ही महानता की पहली शर्त है? यह कविता आधुनिक युग में महानता, संवेदनशीलता, अतिवाद और मानसिक संघर्ष के जटिल संबंधों पर गहन प्रश्न उठाती है।

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शिवालय

परम धाम शिवालय है, ऊर्जा से भरपूर सकारात्मकता का पुंज। शिवलिंग पर गंगाजल अर्पण, पंचोपचार पूजा और ॐ के जाप से होता कल्याण। श्रावण मास में भक्तों का शिवालय में उमड़ता हुजूम, हर हर महादेव के जयकारे गूंजते हैं। महादेव को सिर्फ एक लोटा जल प्रसन्न कर देता है।”

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लव यू….टेक केयर

शायद तुम्हें लगता है… मैं मज़ाक करता हूँ, छेड़ता हूँ… पर सच्चाई ये है… मैं खुद को तुम्हारे शब्दों में सहेज कर रखता हूँ। मैं तुम्हारे दोस्त में माँ की ममता पाता हूँ, बहन की फिक्र पाता हूँ… और दिल के किसी सबसे कोमल कोने में एक ऐसी प्रेमिका का एहसास करता हूँ… जो कभी मिली नहीं, पर हमेशा पास रही।”

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वर्जित इच्छाओं की अपराधिनी…

आज-कललम्बे दिनऔर छोटी रातों मेंकई ख्वाबएक-सी शक्ल लिएआ रहे हैं और दिनबहुत देर सेअलसाई-सी शाम मेंतब्दील हो रहा नहीं-नहींये खूब तेजचुहचुहाती गर्मियों वाले दिन नहीं ये तो बस अभी-अभी आयेवसंत के पीले दिन हैंजो अचानकइस लॉक डाउन मेंप्रौढ़-से हो गए हैं इस बारहोली के सतरंगीदिनों के बादजाने क्यों इतनेबेरंग से हो गए हैंदिन-रात अपने जन्म…

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धर्म और मानवता पर चिंतन करते व्यक्ति के सामने ब्रह्मांड और पृथ्वी का प्रतीकात्मक दृश्य

अगर ईश्वर एक है तो हम क्यों बंटे हैं?”

एक इंसान अपने सृष्टिकर्ता से सवाल करता है कि जब रचनाकार एक है तो उसके नाम इतने अलग क्यों हैं? धर्म, हिंसा, युद्ध और मानवता पर तीखा व्यंग्यात्मक चिंतन.

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क्या मर्द कभी रोते हैं?

“नहीं, कभी नहीं।”“कभी नहीं?”“नहीं, कभी नहीं।”“सच में, कभी नहीं?”“हाँ, सच में कभी नहीं रोते।” हाँ, सच में मर्द कभी नहीं रोते… कहते-कहते आँखों से आँसू छलक पड़े, और उन छलकते हुए आँसुओं में रवानी कब आ गई, पता ही नहीं चला… मुझे नहीं पता कि मर्द पहली बार कब रोया!क्या जब खुदा ने आदम को…

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