
रेनू ‘शब्दमुखर’ प्रसिद्ध लेखिका, जयपुर
ख़ामोश प्रेम-पत्र
मैं तुम्हें
लिखती नहीं
मैं तुम्हें महसूस करती हूँ।
तुम्हारा नाम
मेरे भीतर ऐसे उग आता है
जैसे सूखी ज़मीन पर
पहली बारिश।
कभी-कभी शब्द नहीं आते,तो मैं
तुम्हारी स्मृति को
अपने दिल के हाशिये पर
धीरे से रख देती हूँ-
जैसे किसी
किताब के बीच
सूखा हुआ फूल रख दे।
तुम्हारे बारे में
लिखना नहीं चाहती,
क्योंकि
लिखते ही तुम सीमित हो जाओगे,
और मैं चाहती हूँ-
तुम मेरे भीतर असीम रहो।
अगर कभी
तुम सामने बैठोगे,
तो मैं कविता नहीं पढ़ूँगी,
मैं चुपचाप
तुम्हारे हाथ पर
अपनी हथेली रख दूँगी-
और तुम समझ जाओगे
कि प्रेम कभी-कभी
लफ़्ज़ों से बड़ा होता है।

Thankuuu सुरेश जी