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राब्ता : एक ग़ज़ल

तू ये कहता है कि मुझसे राब्ता ही नहीं,
बेख़ुदी, मसाइल-ए-दिल के तू समझता ही नहीं।

सजा रखे हैं क़ासिद से कई ख़्वाब मैंने,
गले तो लगता है, तू बाहों में सोता ही नहीं।

रक़ीबों की जुर्रत पे तुझे शिकायत भी है,
मज़ाक ये कि कभी पर्दा खींचता ही नहीं।

राहत-ए-दिल, इज़ारा बस दीदार-ए-हुस्न तेरे,
जब से देखा है तुझे, आईना देखता ही नहीं।

मजाल क़मर की, इक रोज़ तेरे कू निकला,
तवाज़ुन में तेरे अब कोई उसे पूछता ही नहीं।

क़वायद-ए-उल्फ़त में काफ़िरों से नहीं मेरे,
दिल तुझे दिया, अब कहीं लगता ही नहीं।

वाक़िफ़ है तू भी “राकेश” की तासीर से,
हद में तो वो कभी कुछ करता ही नहीं।

राकेश कुमार, प्रसिद्ध साहित्यकार, सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल

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