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मुन्ना से कीर्ति राणा-6

त्रकारिता में आत्मसम्मान, कार्यस्थल की राजनीति और पेशेवर चुनौतियों को दर्शाता दृश्य। पत्रकारिता में पद से अधिक महत्वपूर्ण है काम,

दो चेहरे, एक तबादला और महाकाल का भरोसा

suresh parihar editor

प्रस्तुति-सुरेश परिहार (कीर्ति राणा की पुस्तक “किस्से कलमगिरी के” से)

यह कहानी एक ऐसे जांबाज पत्रकार की है, जिसने अपनी पत्रकारिता में कामरेडी अंदाज कभी नही छोड़ा.. वह इंदौर का कल का मुन्ना..आज शहर नहीं देश का एक अच्छे पत्रकारों में शुमार है यह कहानी उसी की जुबानी है. मुन्ना कैसे पत्रकार कीर्ति राणा बना. घटना, देशकाल वातावरण सभी उन्हीं की पुस्तक किस्से कलमगिरी से लिए गए हैं. (कीर्ति राणा की किताब किस्से कलमगिरी के पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी. ऐसा मेरा विश्वास है)
पुस्तक का यह संपादित अंश है. पूरा आर्टिकल किस्से कलमगिरी के में है.

उज्जैन में मुझे ब्यूरो चीफ बनकर जाना था, लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही मेरी पत्रकारिता की एक दिलचस्प परीक्षा शुरू हो चुकी थी. एक तरफ महाकाल का भरोसा था, दूसरी तरफ दफ्तर की राजनीति और बदलते चेहरों का खेल.

उज्जैन ज्वाइन करने के लिए दस दिन का अवकाश मिला था. एक दिन अकेला ही महाकाल के दर्शन करने पहुंच गया. न कोई पत्रकार वाली हेकड़ी, न कोई विशेष व्यवस्था. सामान्य दर्शनार्थियों की कतार में खड़े होकर राजाधिराज से बस इतनी प्रार्थना की, आपकी शरण में आ रहा हूं, मुझे संभालना.
दर्शन करके ऑटो से घड़ीवाला कॉम्प्लेक्स स्थित भास्कर कार्यालय पहुंचा. अनूप शाह, विवेक चौरसिया और धीरेंद्र राय से परिचय हुआ. मैंने कहा, आप सबके साथ काम करने आ रहा हूं. मेरे लिए दो कमरों का कोई किराए का मकान तलाश देना.
तीनों ने स्वागत किया और भरोसा दिलाया कि मकान मिल जाएगा. मेहताजी पहले ही मेरे आने की सूचना दे चुके थे. पता चला कि भाईसाहब धर्मशाला गए हैं. मैं निश्चिंत होकर इंदौर लौट आया. दसवें दिन शाम को इंदौर भास्कर कार्यालय पहुंचा. हुकम से कहा, गर्ग साब को बता दो, मिलने आया हूं.
कुछ देर बाद बुलावा आ गया.मैंने केबिन में प्रवेश किया और बताया कि अगले दिन उज्जैन ज्वाइन कर रहा हूं. उन्होंने चश्मे के ऊपर से मुझे देखा. चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी. तो आप ज्वाइन कर रहे हैं?
मैंने भी आंखों में आंखें डालकर पूछा, इस तो का क्या मतलब है?
वे बोले, पत्र में भले ही ब्यूरो चीफ लिखा हो, मुगालते में मत रहना. आप वहां पांचवें रिपोर्टर के रूप में काम करेंगे. ठीक से काम नहीं कर पाए तो इंदौर लौटने की जरूरत नहीं, सीधे घर चले जाना.
मैंने शांत स्वर में कहा, मेरी फैमिली इंदौर में रहेगी. उज्जैन में मकान का किराया, टिफिन और लैंडलाइन फोन का खर्च बढ़ेगा. कम से कम पंद्रह सौ रुपये वेतन बढ़ना चाहिए.
उनका चेहरा तमतमा उठा…..एक पैसा नहीं बढ़ाऊंगा. इसी तनख्वाह में काम करना है तो करिए, वरना घर चले जाइए.
मेरे भीतर गुस्सा जरूर उठा, लेकिन मैंने उसे दबा लिया. मैं फिर भी ज्वाइन कर रहा हूं.
अब उन्होंने फोन उठाया और विजय शंकर मेहता को आदेश दिया, कीर्ति राणा कल से आपके अंडर में पांचवें रिपोर्टर के रूप में काम करेंगे. कसकर काम लीजिए. ठीक से काम न करें तो तत्काल बाहर कर देना. तभी फोन की घंटी बजी. दूसरी तरफ सुधीरभाईसाब थे. गर्ग साब का लहजा अचानक बदल गया.

जी… मेरे सामने ही खड़े हैं… जी, मैं बता देता हूं. फोन रखते ही उन्होंने दोबारा मेहताजी को फोन लगाया.

इस बार आवाज में आदेश नहीं, संरक्षण था. मेहताजी, कीर्ति राणा आपके यहां ब्यूरो चीफ के रूप में ज्वाइन करेंगे. आपके तीन-चार मठाधीशों को समझा दीजिए कि इन्हें कोई परेशानी न हो. इनके लिए अलग केबिन बनवाइए. इन्हें कोई परेशानी हुई तो बारह बजा दूंगा.
मैं चुपचाप उन्हें देखता रहा. कुछ मिनट पहले मैं पांचवां रिपोर्टर था, अब ब्यूरो चीफ बन चुका था. वही व्यक्ति, वही कमरा, वही कुर्सी, लेकिन बात करने का अंदाज बिल्कुल अलग! मैंने मुस्कुराकर कहा, मैं तो पांचवें रिपोर्टर के रूप में जा रहा हूं न, ब्यूरो चीफ तो हूं नहीं!
वे फीकी हंसी हंसते हुए बोले, जाइए, बढ़िया काम करके दिखाइए. वहां एक साल से ज्यादा कोई ब्यूरो चीफ टिक नहीं पाया है.
बाहर निकलकर ऑपरेटर कालेजी से पूछा, फोन किसका था?
जवाब मिला, सुधीरभाईसाब का.मेरे सामने फिर महाकाल का मंदिर घूम गया. लगा, शायद मेरी प्रार्थना सुन ली गई थी.

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी.
ग्वालियर की पेशकश और उज्जैन का फैसला
इन्हीं दस दिनों में कल्पेश याग्निक ने मुझे चर्चा के लिए बुलाया. मेरा तबादला उज्जैन और जलधारी का ग्वालियर हुआ था. कल्पेशजी ने कहा कि मेरी राजनीतिक खबरों में रुचि और कार्यशैली को देखते हुए ग्वालियर में बेहतर अवसर मिलेंगे.उन्होंने सुझाव दिया कि मैं एमडी साहब को पत्र लिखकर ग्वालियर में पदस्थ करने का अनुरोध करूं. शशि दा को वे उज्जैन भेजने के लिए राजी कर लेंगे. मैंने पूछा, सर, आदेश तो एमडी साहब के हस्ताक्षर से निकला है. मैं ग्वालियर के लिए पत्र लिखूंगा तो सुधीरजी नाराज नहीं होंगे?
मैंने उन्हें वह पुरानी बात भी याद दिलाई, जब जलधारी अपना तबादला बदलवाने उनके पास आए थे. तब कल्पेशजी ने ही कहा था कि एमडी साहब का आदेश नहीं बदल सकता और शशि दा को पहले ग्वालियर ज्वाइन करने दें.अब वे मेरी ओर देखकर पूछ रहे थे, तो आप उज्जैन ही ज्वाइन करेंगे? मैंने कहा, हां. जलधारीजी को आपने ग्वालियर ज्वाइन करने के लिए पहले ही कह दिया है.
वे मेज पर रखे कागज पलटने लगे. मैं उठकर बाहर आ गया.मेरे सामने रास्ता साफ था. एक तरफ पद और संभावनाओं का प्रलोभन था, दूसरी तरफ तय आदेश और अपनी जिम्मेदारी.मैंने उज्जैन जाना चुना. आखिर महाकाल के दरबार में जो प्रार्थना की थी, उसका जवाब मुझे दफ्तर की राजनीति में नहीं, अपने फैसले पर अडिग रहने में दिखाई दे रहा था.

मुन्ना से कीर्ति राणा सीरीज के अन्य भागों को भी पढ़ें
मुन्ना से कीर्ति राणा-5
मुन्ना से कीर्ति राणा-4
मुन्ना से कीर्ति राणा -3
मुन्ना से कीर्ति राणा-2
मुन्ना से कीर्ति राणा-1

kirti rana

किस्से कलमगिरी के पुस्तक के मूल लेखक कीर्ति राणा (वरिष्ठ पत्रकार, इंदौर)

पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए सीख
पत्रकारिता में पद से ज्यादा महत्वपूर्ण आपका काम, किसी के संरक्षण से ज्यादा आपकी काबिलियत और तात्कालिक लाभ से ज्यादा आपका आत्मसम्मान है। विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखें, तथ्यों को समझें और निर्णय भावनाओं में नहीं, विवेक से लें। आपकी असली पहचान आपके काम और विश्वसनीयता से बनती है।

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