
अमिता श्रीवास्तव
“दादी, हाथ कहाँ पोंछूँ?”
मॉल के फूड कोर्ट में वॉफल खाकर चॉकलेट से सनी अपनी नन्हीं हथेलियाँ लिए अंबू मेरे सामने खड़ी थी। पाँच साल की अंबिका मेरी अंबू थी।
“रुको, अभी रूमाल देती हूँ।” कहकर जैसे ही मैं अपना पर्स खोलने चली, उसने झट मेरे आँचल में अपनी हथेलियाँ पोंछ लीं। क्रीम कलर की साड़ी का आँचल चॉकलेटी हो गया था।
“ये क्या किया?” कहकर मैं झुँझलाई तो वह कूद-कूदकर हँसने लगी।
“अँधेरा होने को आया, जल्दी घर चलो। कल स्कूल जाना है।”
“लेकिन दादी, बस स्टॉप पर आप ही मुझे लेने आना।”
“ठीक है,” मैंने कहा।
बस स्टॉप पर नियत समय पर बस आ गई थी। मुझे देखकर वह चहक उठी। उसका बैग और बोतल मैंने ले लिए थे।
“दादी, धूप लग रही है।” वह ठुमकी।
“मैं छाता लाना भूल गई, अंबू।” मेरे इतना कहते ही उसने झट मेरा आँचल खींचकर अपना सिर ढक लिया।
“ये लो, बन गई छतरी।” वह उछलते हुए चलने लगी।
“दादी, शाम को पार्क भी तो चलना है, चलेंगी न?” वह फिर चहकी।
“चलूँगी बाबा, पहले तुम खाना खाकर थोड़ी देर सो जाना।”
अंबू ने सहमति में अपना सिर हिला दिया।
सोते समय वह कुनमुनाई, “दादी, मुझे चादर ओढ़नी है।”
“यहाँ कोई चादर नहीं है। तूने ज़रूर अपनी किसी गुड़िया को ओढ़ा दी होगी।” मैंने बिस्तर के पायताने देखते हुए कहा।
उसने नींद में ही मेरा आँचल खींचा और तानकर सो गई।
शाम होते ही हम दोनों पार्क के लिए निकल गए। मैं आगे और अंबू पीछे मेरे आँचल का दूसरा सिरा पकड़कर उछलते-कूदते चल रही थी। कभी वह आँचल टिक-टिक घोड़ा बन जाता, तो कभी छुक-छुक रेलगाड़ी। मेरे आँचल में उसकी आधी दुनिया थी और वह मेरी पूरी दुनिया।
अचानक उसने मेरा आँचल ज़ोर से खींचा। मुझे लगा कि मैं गिर पड़ूँगी। मैं लड़खड़ाकर पीछे मुड़ी। मेरी यह दशा देखकर वह बेतहाशा हँसने लगी। आँखें बंद और पूरी बत्तीसी बाहर। उसकी इस मासूम खिलखिलाहट पर मैं न्योछावर थी। कहीं उसे मेरी ही नज़र न लग जाए, इस डर से मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
और उन बंद आँखों में लहरा उठा था मेरी दादी का आँचल, जो उम्र के इस पड़ाव पर आज भी हर सुख-दुःख में मेरे सिर को छूता हुआ निकल जाता है।
