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भरोसे की डोर

राघव और रिद्धिमा की प्रेम कहानी भरोसे की डोर का भावनात्मक दृश्य भरोसे की डोर – राघव और रिद्धिमा

सुरेश परिहार

शाम ढल रही थी। आसमान में हल्की गुलाबी रोशनी बची थी। राघव अपने कमरे की खिड़की के पास बैठा था और रिद्धिमा से फोन पर बात कर रहा था। दोनों अलग-अलग शहरों में रहते थे, लेकिन उनके बीच की दूरी कभी उनके संवाद में आड़े नहीं आई थी। कई वर्षों से एक-दूसरे को जानने वाले राघव और रिद्धिमा के रिश्ते में दोस्ती भी थी, अपनापन भी और एक ऐसा विश्वास भी, जो समय के साथ और गहरा होता गया था।

कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर राघव ने खामोशी तोड़ते हुए कहा,

“रिद्धिमा, एक बात कहूँ?”

“हम्म, कहो। क्या हुआ? आज कुछ परेशान लग रहे हो।”

राघव ने गहरी साँस ली।

“मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन कभी-कभी तुम्हें खो देने का डर बहुत सताता है। ऐसा लगता है जैसे मेरी जिंदगी की हर अच्छी बात तुमसे जुड़ी हुई है। तुम्हारे बिना दिन अधूरे लगते हैं। जब तुम कुछ देर के लिए भी व्यस्त हो जाती हो और तुम्हारा फोन नहीं आता, तो मन में न जाने कितने सवाल उठने लगते हैं।”

दूसरी ओर कुछ पल खामोशी रही। फिर रिद्धिमा ने मुस्कुराते हुए पूछा,

“और क्या-क्या सोच लेते हो जनाब?”

राघव उसकी बात पर हल्का-सा मुस्कुराया, लेकिन आवाज में छिपी बेचैनी अब भी कायम थी।

“मैं जानता हूँ कि यह डर शायद बेवजह है। तुम मेरे साथ हो, फिर भी मन कभी-कभी घबरा जाता है। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। तुम मेरी आदत नहीं हो, रिद्धिमा। तुम वह हिस्सा हो, जिसके साथ मैंने अपने आने वाले कल के सपने देखे हैं।”

उसकी आवाज थोड़ी भर्रा गई।

“कई लोग जिंदगी में आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन तुम्हारे आने के बाद मुझे लगा कि किसी से बिना किसी दिखावे के अपने मन की बात कही जा सकती है। जब परेशान होता हूँ, तो सबसे पहले तुम्हारा ख्याल आता है। जब खुश होता हूँ, तब भी वह खुशी तुम्हारे साथ बाँटने का मन करता है। इसलिए जब सोचता हूँ कि कहीं तुम मुझसे दूर चली गईं तो… बहुत डर लगता है।”

रिद्धिमा कुछ क्षण चुप रही। वह राघव की भावनाओं को समझती थी, लेकिन उसके इस डर को लेकर चिंतित भी थी।

“राघव, तुम हमेशा ऐसी बातें क्यों करते हो? मैं कहीं जा रही हूँ क्या?”

“नहीं… लेकिन डर तो तर्क नहीं देखता न। वह बस मन में आ जाता है।”

रिद्धिमा ने गंभीर स्वर में कहा,

“सुनो, सबसे पहले तो ऐसी बातें सोचकर खुद को परेशान करना बंद करो। किसी भी रिश्ते की नींव डर पर नहीं, भरोसे पर टिकती है। मैं तुम्हारे साथ हूँ और जब तक हमारे बीच सच्चाई, सम्मान और विश्वास रहेगा, तब तक हमारे रिश्ते को कोई कमजोर नहीं कर सकता।”

राघव ने धीरे से पूछा,

“सच कह रही हो न?”

“हाँ, बिल्कुल। लेकिन मेरी भी एक बात ध्यान से सुनना।”

“कहो।”

रिद्धिमा की आवाज में अब पहले से अधिक गंभीरता थी।

“मैं भविष्य नहीं जानती, राघव। कोई भी नहीं जानता। लेकिन इतना जरूर जानती हूँ कि किसी रिश्ते को हमेशा बनाए रखने के लिए सिर्फ प्रेम काफी नहीं होता। उसके साथ ईमानदारी, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी भी जरूरी होती है।”

राघव ध्यान से उसकी बात सुन रहा था।

“जिस दिन तुम्हारे व्यवहार में ईमानदारी कम होने लगेगी, जिस दिन तुम्हारे शब्द और तुम्हारे मन की बात अलग-अलग होने लगेंगी, उस दिन हमारे रिश्ते में दरार आ सकती है। अगर कभी तुम किसी बात को छिपाने लगो, संवाद की जगह बहाने आने लगें, सम्मान की जगह उपेक्षा आ जाए या मुझे यह महसूस होने लगे कि तुम्हारी प्राथमिकताओं में मेरी जगह सिर्फ तुम्हारी बातों में है, दिल से नहीं, तो मुझे बहुत दुख होगा।”

राघव ने बीच में कुछ कहना चाहा, लेकिन रिद्धिमा ने अपनी बात पूरी की।

“रिश्ते हमेशा किसी बड़ी गलती से ही नहीं टूटते। कई बार छोटी-छोटी अनदेखियाँ, अधूरे सच, बार-बार टाले गए सवाल और एक-दूसरे की भावनाओं को हल्के में लेना भी दो लोगों के बीच दूरी पैदा कर देता है।”

राघव कुछ देर खामोश रहा। फिर बोला,

“मैं समझता हूँ, रिद्धिमा। मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरी वजह से तुम्हें ऐसा महसूस हो।”

“और मैं भी नहीं चाहूँगी कि मेरे किसी व्यवहार से तुम्हारे मन में बेवजह का डर पैदा हो। हम दोनों इंसान हैं। कभी गलतफहमी हो सकती है, कभी किसी बात पर नाराजगी भी हो सकती है। लेकिन हमें एक-दूसरे से बात करना नहीं छोड़ना है। चुप रहकर मन में कहानियाँ गढ़ने से बेहतर है कि हम अपने सवाल एक-दूसरे से पूछें।”

राघव के चेहरे पर धीरे-धीरे सुकून उतरने लगा।

“मतलब तुम्हें खोने का डर छोड़ दूँ?”

रिद्धिमा हँस पड़ी।

“डर छोड़ो और भरोसा पकड़ो। मुझे बाँधकर रखने की कोशिश मत करना, राघव। बस इतना करना कि जब भी जिंदगी हमें किसी उलझन के सामने खड़ा करे, हम एक-दूसरे का हाथ छोड़ने से पहले बात जरूर करें।”

राघव भी मुस्कुरा दिया।

“तुम्हें पता है, तुम्हारी यही बातें मुझे तुम्हारे और करीब ले आती हैं।”

“और तुम्हारी यही बेचैनियाँ मुझे तुम्हें समझाने के नए-नए तरीके खोजने पर मजबूर कर देती हैं,” रिद्धिमा ने हँसते हुए कहा।

दोनों हँस पड़े। कुछ देर पहले तक जो बातचीत एक अनजाने डर से शुरू हुई थी, अब वह अपनापन और सुकून बनकर उनके बीच बह रही थी।

फोन रखने से पहले राघव ने कहा,

“एक बात और, रिद्धिमा।”

“अब क्या?”

“धन्यवाद। मेरे डर को गलत कहकर खारिज करने के बजाय उसे समझने के लिए।”

रिद्धिमा का स्वर नरम पड़ गया।

“रिश्ते में सिर्फ खुशियाँ ही नहीं बाँटी जातीं, राघव। डर और असुरक्षाएँ भी बाँटी जाती हैं। बस इतना याद रखना कि भरोसा माँगने से नहीं, अपने व्यवहार से कमाया जाता है।”

उस शाम फोन कटने के बाद राघव देर तक खिड़की के बाहर डूबते सूरज को देखता रहा। उसके भीतर का डर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था, लेकिन अब उसे समझ आ गया था कि प्रेम का अर्थ किसी को खोने की आशंका में जीना नहीं, बल्कि उसे विश्वास के साथ अपनी जिंदगी में जगह देना है।

राघव और रिद्धिमा के बीच शहरों की दूरी थी, लेकिन उस दूरी को पाटने के लिए उनके पास संवाद था, अपनापन था और एक-दूसरे को समझने की इच्छा थी।

शायद किसी भी रिश्ते की सबसे खूबसूरत सच्चाई यही है—प्रेम किसी को बाँधकर रखने का नाम नहीं, बल्कि ऐसा भरोसा है जिसमें दो लोग हर दिन एक-दूसरे को चुनते हैं।

क्योंकि रिश्तों की डोर वादों से नहीं, सच्चाई से मजबूत होती है। और जहाँ भरोसा कायम रहता है, वहाँ दूरियाँ भी साथ को कमजोर नहीं कर पातीं।

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